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27. सभी धर्मों का त्याग

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श्रीकृष्ण स्वधर्म ( 2.31-2.37) और परधर्म ( 3.35) के बारे में बताते हैं और अंत में सभी धर्मों को त्यागकर परमात्मा के साथ एक होने की सलाह देते हैं ( 18.66) । अर्जुन का विषाद उसके भय से उत्पन्न हुआ कि यदि उसने युद्ध लड़ा और अपने भाइयों को मार डाला तो उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी। श्रीकृष्ण उसे कहते हैं कि युद्ध से पलायन करने पर भी वह अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाएगा क्योंकि युद्ध करना उसका स्वधर्म है ( 2.34-2.36) । समाज यह मानेगा कि अर्जुन युद्ध में उतरने से डर गया और किसी क्षत्रिय के लिए युद्ध से डरना मृत्यु से भी अधिक अपमानजनक है। श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि “ स्वधर्म भले ही दोषपूर्ण या गुणों से रहित हो परन्तु परधर्म से उत्तम है और स्वधर्म के मार्ग में तो मृत्यु भी कल्याणकारक है क्योंकि परधर्म भय देने वाला है ” ( 3.35) । परधर्म सहज और आकर्षक प्रतीत होता है तथा हमारी बहिर्मुखी इन्द्रियों को अधिक अनुकूल लगता है , विशेषकर जब हम सफल लोगों को देखते हैं। सामान्यतः हमारी आत्म-मूल्य की भावना दूसरों के साथ की गई अनुकूल तुलनाओं से पोषित होती है। इसमें वह प्रतिष्ठित परिव...