192. ‘वह’ हैं भी और नहीं भी

 

श्रीकृष्ण ‘तत्’ शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अनुवाद सामान्यतः ‘वह’ के रूप में किया जाता है। तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। वे कहते हैं कि ॐ तत् सत् -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं (17.23)। जब हम परमात्मा का स्मरण या उपासना करते हैं तब भी हम अलग बने रहते हैं। क्योंकि उपासक और उपास्य के रूप में एक द्वैत बना रहता है। इस भेद को समाप्त कर एकत्व की अवस्था को व्यक्त करने के लिए ही ‘तत्’ -अर्थात् ‘वह’ -शब्द का प्रयोग किया गया है।

श्रीकृष्ण कहते हैंमैं ‘तत्’ (वह) का वर्णन करूँगा जो जाननेयोग्य है जिसे जानकर मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है। वह परम ब्रह्म जो अनादि है, उसे न सत् कहा जाता है और न असत् ही (13.13)। वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है (13.14)। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परंतु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगनेवाला है” (13.15)। यह वर्णन अर्जुन के उस प्रश्न के उत्तर में है -“क्या जानने योग्य है?”

मृत्यु का भय हमारे सभी भय का मूल है। प्रतिष्ठा या संपत्ति के खोने का डर भी एक प्रकार की ‘मृत्यु’ ही है। दूसरे शब्दों में भय से मुक्त होना ही अमरत्व है। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि जब ‘तत्’ का बोध हो जाता है तब मनुष्य समस्त भय से मुक्त होकर अमरत्व का अनुभव करता है।

पूर्व में श्रीकृष्ण ने ‘सत्’ को शाश्वत बताया था और ‘असत्’ को वह जो न अतीत में था और न भविष्य में रहेगा (2.16); तथा दोनों के बीच भेद करना सीखने को कहा था। इस सूक्ष्मता को समझाने के लिए प्रायः रस्सी-सर्प का उदाहरण दिया जाता है। श्रीकृष्ण पहले कह चुके हैं कि वे दोनों हैं और आगे कहते हैं कि ‘तत्’ दोनों ही नहीं है। बात यह है कि पहले हम दोनों को अलग-अलग पहचानने की क्षमता विकसित करें और फिर यह अनुभूति करें कि ‘वह’ दोनों भी है और दोनों से परे भी। इसी प्रकार ‘तत्’ सगुण (रूपयुक्त) भी है और निर्गुण (निराकार) भी। जिसकी आँखें और कान सर्वत्र हैं, वह सब कुछ देखता और सुनता है; जिसके हाथ सर्वत्र हैं, उसकी सहायता उन सभी के लिए उपलब्ध है जो श्रद्धा और भक्ति के साथ उसकी ओर अग्रसर होते हैं।

हमारा मन स्वभावतः विभाजन करने का अभ्यस्त है जबकि ‘जानने योग्य सत्य’ प्रत्यक्ष विरोधाभासों का समन्वय है। यह ठीक वैसा ही है जैसे अनेक रंगों का मिश्रण होकर श्वेत बन जाना या प्रकाश का तरंग-कण द्वैत होना। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण पहले कह चुके हैं  “जब तत् को जान लेते हैं तब जानने योग्य कुछ और शेष नहीं रह जाता” (7.2)।


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