40. आंतरिक यात्रा के लिए सुसंगत बुद्धि
हमारे
भीतरी और बाहरी हिस्सों का मिलन ही योग है। इसे ‘कर्मयोग’, ‘भक्तियोग’,
‘सांख्ययोग’, ‘बुद्धियोग’ जैसे कई
मार्गों से प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर उसके अनुकूल
मार्गों से योग प्राप्त कर सकता है।
श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहते हैं कि
“इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न
श्रेणी का है। इसलिए तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूंढ अर्थात् बुद्धियोग का
ही आश्रय ग्रहण कर
क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं” (2.49)। इससे पहले
श्रीकृष्ण ने कहा कि “कर्मयोग
में
बुद्धि सुसंगत है और जो अस्थिर हैं उनकी बुद्धि बहुत भेदों
वाली होती है” (2.41)।
एक
बार जब बुद्धि सुसंगत हो जाती है तब वह आध्यात्मिक यात्रा करने
में सक्षम हो जाती है,
जो अन्यथा कठिन है। प्रत्येक यात्रा में दिशा और गति दोनों का
होना आवश्यक है। श्रीकृष्ण का बुद्धियोग का सन्दर्भ अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था की
ओर यात्रा की दिशा के बारे में है। सामान्यतः हम अपनी सुसंगत बुद्धि का उपयोग भौतिक
इच्छाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। यह श्लोक संकेत देता है कि हमें उसी सुसंगत बुद्धि
का उपयोग स्वयं की ओर अपनी यात्रा को साधने के लिए करना चाहिए।
आंतरिक
यात्रा में सुसंगत बुद्धि के प्रयोग के प्रारम्भिक संकेत तब दिखाई देते हैं जब हम अपनी स्थाई मान्यताओं, भावनाओं, धारणाओं, विचारों,
कर्मों और यहाँ तक कि अपने शब्दों पर भी प्रश्न उठाने लगते
हैं। जैसे विज्ञान में प्रश्न करने की प्रवृत्ति ज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ाती है, उसी प्रकार प्रश्न पूछने की यही प्रवृत्ति परम सत्य को उजागर करने के लिए
उपयोगी है। श्रीकृष्ण अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था की ओर यात्रा में प्रश्न करने के
गुण को विकसित करने की सलाह देते हैं (4.34)।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि
जो लोग कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म करते हैं,
वे अवश्य ही दुःख में जीते हैं। हम यह प्रवृत्ति इसलिए विकसित करते
हैं क्योंकि जब हम अपने कर्मों के इच्छित फल प्राप्त करते हैं तब हमें सुख का
अनुभव होता है। परंतु इस द्वैतपूर्ण संसार में प्रत्येक सुख समय के साथ दुःख में बदल
जाता है
और यह दुःख को और बढ़ाकर हमारे जीवन को नर्क
बनाता है।
श्रीकृष्ण
कभी भी हमें द्वन्द्वों से बचाने का वादा नहीं करते हैं अपितु
हमें बुद्धि के उपयोग के द्वारा इन द्वंद्वो को पार करके आत्मवान् बनने के लिए
कहते हैं। यह न तो जानने की बात है और न ही करने की; यह
मात्र ‘होने’ की अवस्था है।
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