129. भगवान ‘पासा’ खेलते हैं
शुरुआाती
ब्रह्माण्ड के सृजन के समय यह सिर्फ ऊर्जा थी और बाद
में पदार्थ का आकार लिया। वैज्ञानिक रूप से यह स्वीकार किया
जाता है कि ब्रह्माण्ड में तापमान, घनत्व और मैटर-एंटीमैटर के
अनुपात में सूक्ष्म (क्वांटम) भिन्नता थी और इन भिन्नताओं का कोई वैज्ञानिक कारण
नहीं है। ये परिस्थितियाँ ही पदार्थ के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं और विज्ञान
इस बात से सहमत है कि आज हम अपने चारों ओर जो विविधता देखते हैं उसे बनाने के लिए भगवान्
पासा खेलते हैं।
इस
संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं उनकी अपरा प्रकृति अष्टांगिक है। अग्नि, पृथ्वी,
जल,
वायु और आकाश भौतिक संसार के लिए हैं और मन, बुद्धि और अहंकार जीवों के लिए हैं (7.4)। अग्नि का अभिप्राय
उस ऊर्जा से है जो आदिकाल से मौजूद है। ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हुआ जिसमें एक
ठोस अवस्था (पृथ्वी),
तरल अवस्था (जल) और गैसीय अवस्था (वायु) हैं। उन सभी को
रखने के लिए जगह यानी आकाश चाहिए।
जीवों
के संदर्भ में,
अस्तित्व बनाए रखने के लिए तर्कपूर्ण सोच आवश्यक होती है। मन
सोच का मूल है
जो शीघ्र और सहज होता है। बुद्धि सोच का उच्च स्तर है जो धीमा और चिंतनशील होता है। अहंकार वह अंतिम बाधा है जिसे परमात्मा की उच्च प्रकृति
में प्रवेश करने के लिए पार करना पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं उनकी परा प्रकृति ही
जीव-तत्त्व है
जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करता है (7.5), ठीक उसी प्रकार जैसे अदृश्य सूत्र मणियों को धारण किए रहता है (7.7)।
श्रीकृष्ण
कहते हैं “हजारों मनुष्यों में कोई
एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक
मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात् यथार्त रूप से जानता है” (7.3)। इसका मतलब यह है कि अहंकार की बाधा को पार
करना एक कठिन कार्य है और यहाँ उसी का संकेत दिया गया है।
इसे
देखने का एक और तरीका यह है कि हमने 13.8 अरब वर्षों की
क्रमागत उन्नति की यात्रा के दौरान जाने-अनजाने में बहुत सारी धूल-मिट्टी इकट्ठा
कर ली। पहला कदम इस धूल-मिट्टी के बारे में जागरूक होना है जो अहंकार के रूप में
प्रकट होती है और दूसरा कदम इससे छुटकारा पाना है।

Comments
Post a Comment