39. कर्तापन की भावना को छोड़ना


 

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, तू आसक्ति / संङ्ग को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित होकर कर्तव्य कर्मों को कर। यह समत्व ही योग कहलाता है (2.48)। इसका अर्थ है, जब हम इन द्वन्द्वों के साथ अपनी पहचान करना बंद कर देते हैं तो हम जो कुछ भी करते हैं वह सामंजस्यपूर्ण होगा।

हमारा दैनिक जीवन अनेक निर्णयों और विकल्पों को चुनने से भरा होता है। हमारा सतत निर्णय लेने वाला मन उपलब्ध विकल्पों में से ऐसा चयन करता रहता है जिससे सुख/विजय/सफलता अधिकतम हो और दुःख/हानि/पराजय न हो (2.38)।

समत्व द्वन्द्वों को समान मानने की क्षमता है जिसे सामान्यतः द्वन्द्वों को पार करना कहा जाता है। जब यह अनुभूति गहराई से उतरती है तो मन शक्तिहीन हो जाता है और विकल्प रहित जागरूकता प्राप्त करता है। हम सोते समय, नशे में या औषधि के प्रभाव में भी इस विकल्प रहित अवस्था का अनुभव कर सकते हैं लेकिन वास्तविक समत्व वह है जब हम निर्णय लेने में सक्षम होते हुए भी निर्णय किए बिना स्थिति का अवलोकन कर पाते हैं। यह साक्षीभाव से वर्तमान क्षण में जागरूक रहने की अवस्था है।

कर्म करते समय समता प्राप्त करने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि हम  कर्तापन के भाव को छोड़कर साक्षी बन जाएँ। यह पूरी तीव्रता, प्रतिबद्धता, समर्पण, दक्षता और जुनून के साथ किसी नाटक में भूमिका निभाने जैसा है।

इसी तरह जीवन के महान् मंच पर दी गई भूमिकाओं को हमें पूरी लगन के साथ निभाना चाहिए। यह एक पुत्र/पुत्री, पत्नी/पति, माता-पिता, मित्र, कर्मचारी, नियोक्ता, सहकर्मी, पर्यवेक्षक आदि की भूमिका हो सकती है। एक दिन में हम कई अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हैं और प्रत्येक भूमिका को निभाते हुए हमें अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन करना चाहिए, लेकिन यह अच्छी तरह से जानते हुए कि हमारी भूमिका नाटक का सिर्फ एक हिस्सा है।

जीवन में हमें जो भूमिकाएँ मिली हैं, उन सभी भूमिकाओं में कुछ दिनों के लिए इसका अभ्यास करना शुरू कर सकते हैं और अपने जीवन  में आने वाले सामंजस्य को स्वयं देख सकते हैं।


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