37. क्रिया और प्रतिक्रिया

 


श्रीकृष्ण कहते हैं हमें कर्म करने का अधिकार है लेकिन कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अकर्म की ओर झुक जाएँ, जो निष्क्रियता या परिस्थितियों की प्रतिक्रिया मात्र हैं। एक तरह से यह श्लोक जागरूकता और करुणा की बात करता है -जागरूकता इस सत्य का बोध है कि कर्म और कर्मफल अलग-अलग हैं तथा करुणा वह दृष्टि है जो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के प्रति भी समान सद्भाव रखती है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म किए बिना हमारा जीवित रहना असम्भव है क्योंकि भौतिक शरीर के रखरखाव के लिए खाने आदि जैसे कर्मों की आवश्यकता होती है (3.8)। सत्व, रज, तमो गुण हमें लगातार कर्म की ओर ले जाते हैं (3.5)। इसलिए अकर्म के लिए शायद ही कोई जगह है।

यह ‘प्रतिक्रिया’ को दर्शाता है। उदाहरण के लिए यदि हम समाचार पढ़ते, सुनते या देखते समय अपनी प्रवृत्तियों का अवलोकन करें तो हमें पता चलता है कि हमारे भीतर अनेक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसा तब होता है जब धर्म, जाति, राष्ट्रीयता, विचारधारा आदि जैसे हमारे विश्वासों के पक्ष या विपक्ष में हम कुछ देखते, सुनते या पढ़ते हैं। यही स्थिति परिवार और कार्यस्थल पर होने वाले संवादों में भी दिखाई देती है जहाँ हमारे अधिकांश शब्द और कर्म ‘प्रतिक्रिया’ होते हैं। ऐसी परिस्थितिजन्य प्रतिक्रियाएँ हमारे जीवन से आनन्द छीन लेती हैं क्योंकि हम जागरूकता और करुणा से उत्पन्न ‘कर्म’ से दूर चले जाते हैं। सजग बुद्धि वाले व्यक्ति दूसरों के दृष्टिकोण को बेहतर समझ सकते हैं और उसके अनुसार सहानुभूतिपूर्ण एवं समझदारीपूर्ण व्यवहार कर सकते हैं।

श्रीकृष्ण संकेत करते हैं कि हमें दूसरों के कर्मों से उत्पन्न प्रतिक्रिया रूपी अकर्म के प्रति सजग रहना चाहिए। साथ ही वे यह भी सलाह देते हैं कि हम ऐसे कर्मों में प्रवृत्त न हों जिनसे दूसरों में प्रतिक्रिया उत्पन्न होने की संभावना हो। आगे वे कहते हैं कि जो भक्त न तो जगत् को उद्विग्न करता है और न ही स्वयं जगत् से उद्विग्न होता है, वह उन्हें प्रिय है (12.15)।

इसका अभ्यास करने से हम परिपक्वता, सत्यनिष्ठा और आनन्द के उच्चतम स्तर तक पहुँच सकते हैं।

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