25. गुलाब कमल नहीं बन सकता


श्रीकृष्ण स्वधर्म (अपने स्वभाव अथवा दृष्टिकोण) के विषय में बताते हैं (2.31–2.37) और अर्जुन को सलाह देते हैं कि क्षत्रिय होने के कारण उसे युद्ध करने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि वही उसका स्वधर्म है (2.31)।

धर्म अथवा सत्य एक है और विराट है। हमारी सीमित इन्द्रियों के लिए उसे पूर्णतः समझ पाना कठिन है। हम उसे विभिन्न प्रकार से अनुभव करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे प्रसिद्ध कथा के अंधे व्यक्ति एक ही हाथी को स्पर्श के आधार पर अलग-अलग रूप में अनुभव करते हैं। यदि कोई उसे दाँत के रूप में अनुभव करता है तो वही उसकी वास्तविकता अथवा स्वधर्म बन जाता है। आधुनिक संदर्भ में इसे पैराडाइम (paradigm) अथवा दृष्टिकोण (frame of reference) कहा जाता है।

स्वधर्म का पालन करने का अर्थ है सत्य की अपनी अनुभूति के प्रति निष्ठावान बने रहना -जैसे वह व्यक्ति जो हाथी को दाँत के रूप में अनुभव करता है -न कि किसी अन्य के आकर्षक दृष्टिकोण (परधर्म) को अपनाना जो उसे पैर या पूँछ के रूप में देखता है। योद्धा होना अर्जुन का स्वधर्म है और वह एक क्षण में कुछ और नहीं बन सकता।

‘क्षत्रिय ‘क्षत’, ‘त्र’ एवं 'इय' शब्दों का संयोजन है। क्षत का अर्थ है चोट और 'त्र' का अर्थ है रक्षा करना। क्षत्रिय वह है जो चोट से रक्षा करता है।

इसका सर्वोत्तम उदाहरण माता है जो गर्भ में शिशु की रक्षा करती है और बच्चों को तब तक संरक्षण देती है जब तक वे अपने पैरों पर खड़े न हो जाएँ। इस प्रकार वह हमारे जीवन की पहली क्षत्रिय है। हो सकता है कि वह प्रशिक्षित न हो या बाल-पालन का अनुभव न रखती हो किन्तु यह गुण उसमें स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है। यही स्वधर्म की एक झलक है।

एक बार एक गुलाब एक भव्य कमल के सौन्दर्य से मोहित हो गया और उसमें कमल बनने की इच्छा जाग उठी। किन्तु कोई भी गुलाब कमल नहीं बन सकता। गुलाब वह बनने की इच्छा कर रहा था जो उसकी स्वाभाविक क्षमता के परे था। इसी प्रकार हममें भी अपने वास्तविक स्वरूप से भिन्न बनने की प्रवृत्ति होती है जिसके परिणामस्वरूप वैसी ही विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है जैसी अर्जुन ने अनुभव की। गुलाब अपना रंग, आकार और रूप बदल सकता है किन्तु वह गुलाब ही रहेगा -और वही उसका स्वधर्म है।


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