160. क्योंकि...वे ऐसा कहते हैं
अर्जुन
कहते हैं
“आप परम ब्रह्म, परम
धाम,
परम पवित्र, सनातन, दिव्य,
आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी हैं
(10.12)। नारद,
असित, देवल और व्यास जैसे सभी
ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं, और
अब आप स्वयं मुझे यह बात कह रहे हैं (10.13)। आपने जो कुछ भी कहा है, मैं उसे सत्य मानता हूँ, क्योंकि हे भगवान्, न तो देवता और न ही असुर आपके महान् स्वरूप को समझ सकते हैं” (10.14)।
आदर्श
व्यक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और हम सभी बड़े होते
हुए उनसे प्रेरित होते हैं। बच्चों के लिए माता-पिता आदर्श होते हैं, विद्यार्थियों के लिए शिक्षक और जीवन के आगे के चरणों में
सफल और उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोग आदर्श बनते हैं। प्रारम्भिक चरणों में उनसे प्रेरणा
लेना उपयोगी होता है परन्तु बाद के चरणों में वे बैसाखियाँ बन
सकते हैं। एक बच्चे को चलने और दौड़ने का आनन्द लेने के लिए वॉकर को छोड़ना चाहिए।
यह इस बात को समझने के बारे में है कि प्रेरणास्रोत मील के पत्थर की तरह होते हैं, मंजिल नहीं।
अर्जुन भी अपने विश्वास के समर्थन के लिए
नारद और व्यास जैसे आदर्शों का सहारा ले रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें अभी
भी श्रीकृष्ण पर भरोसा नहीं है और यह सार्वभौमिक समस्या है जहाँ हमारे सामने खड़ी
दिव्यता को पहचानना एक संघर्ष होता है।
अर्जुन
आगे कहते हैं
“हे परम पुरुष, आप
सभी जीवों के उद्गम और स्वामी हैं, देवों के देव और
ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। वास्तव में केवल आप स्वयं ही अपनी अचिंतनीय शक्ति से
स्वयं को जानते हैं (10.15)। कृपया मुझे अपनी दिव्य अभिव्यक्तियों के बारे में
विस्तारपूर्वक बताएं,
जिनके द्वारा आप सभी लोकों में व्याप्त हैं (10.16)। हे योगेश्वर, मैं किस प्रकार आपका निरन्तर चिन्तन कर सकता हूँ और आपको कैसे जान सकता हूँ, और मैं किन-किन रूपों में आपका स्मरण कर सकता हूँ (10.17)। हे जनार्दन! कृपया
मुझे पुनः अपनी योगशक्ति और वैभवों के संबंध में विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपकी अमृत वाणी को सुनकर मैं कभी तृप्त नहीं होता हूँ” (10.18)। अर्जुन का अपनी अज्ञानता को ईमानदारी से स्वीकार
करना और उनकी सीखने की इच्छा, इन बातों से स्पष्ट होती
है।

Comments
Post a Comment