4. धारणा का जाल
गीता
इस बात पर जोर देती है कि हमें अपनी इन्द्रियों को समझना चाहिए क्योंकि वे हमारे आंतरिक और बाह्य संसार के बीच के सेतु हैं। श्रीकृष्ण कहते
हैं इन्द्रियों और उनके विषयों का संयोग सुख और दुःख जैसे द्वन्द्वों को उत्पन्न
करता है। वे अर्जुन को उपदेश देते हैं कि इनका धैर्यपूर्वक सहन करना सीखो क्योंकि ये अनित्य हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारे मस्तिष्क
में लगभग सौ अरब न्यूरॉन (neuron) होते हैं। इनमें से कुछ शरीर
के स्वचालित कार्यों को नियंत्रित करने के लिए डी.एन.ए (DNA) द्वारा संयोजित होते हैं जबकि अन्य हमारे जीवनकाल
में हमारे द्वारा संयोजित किए जाते हैं। वाहन चलाना सीखने के पहले दिन हम सभी को वाहन चलाना कठिन लगा पर अभ्यास के साथ धीरे-धीरे
हमें इसकी आदत हो गई। ऐसा मस्तिष्क द्वारा अप्रयुक्त न्यूरॉन्स के साथ की गई हार्डवायरिंग
के कारण होता है
जो ड्राइविंग से जुड़ी सभी गतिविधियों का समन्वय करता है।
साधारण
चलने से लेकर खेलकूद और शल्य चिकित्सा (surgery) जैसे
जटिल कार्यों तक इस प्रकार की हार्डवायरिंग सभी कौशलों में
देखी जाती है। हार्डवायरिंग से नये तंत्रिका प्रतिरूप (neural
pattern) बनते हैं जिससे मस्तिष्क की बहुत सारी ऊर्जा बचती है और हमारा
जीवन आसान हो जाता है।
एक
नवजात शिशु ‘सार्वभौमिक’ होता है अर्थात् एक कोरे कागज की तरह जो नई चीजों को ग्रहण करने में सक्षम होता है। परिवार, साथियों और समाज के प्रभाव से मस्तिष्क में अनेक तंत्रिका-प्रतिरूप बनते हैं। ये
प्रतिरूप हमें बाहरी दुनिया से अलग-अलग प्रकार के अनुभवों और संवेदनाओं को प्राप्त
करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसके लिए हम जीवनभर कड़ी मेहनत करते हैं। उदाहरण के
लिए
हम सभी अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं क्योंकि हमारे तंत्रिका-प्रतिरूप उसी की अपेक्षा करते हैं। ये तंत्रिका-प्रतिरूप
अपेक्षाओं,
पूर्वाग्रहों और निर्णयों की आधारशिला हैं।
इन
तंत्रिका प्रतिरूपों और किए गए प्रयासों का संयोजन ही अहंकार है। आज की दुनिया में
सफलता और खुशी को अक्सर ऐसी संवेदनाओं और अनुभवों की प्राप्ति माना जाता है जो हमारे तंत्रिका प्रतिरूपों के अनुकूल हों। जब हम न्यूरल पैटर्न्स की सीमाओं
से ऊपर उठते हैं
तब हम स्वयं में केंद्रित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप आनन्द प्रवाहित होता है क्योंकि हम बाहरी संवेदनाओं पर निर्भर नहीं रहते जिसे श्रीकृष्ण ‘आत्मरमण’
कहते हैं।
भगवद्गीता
में वर्णित विविध निर्देशों और साधनों का उपयोग करके हम इन तंत्रिका-प्रतिरूपों को
तोड़ सकते हैं और एक आनन्दमय जीवन जी सकते हैं।
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