2. मंजिल एक रास्ते अनेक
‘मंजिल
एक, रास्ते अनेक’ कहावत की भाँति गीता में बताए
गए सभी मार्ग हमें हमारी अंतरात्मा की शाश्वत
अवस्था तक ले जाते हैं। कुछ रास्ते एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। वास्तव में
यह एक वृत्त की तरह है जहाँ दोनों ओर की यात्रा हमें एक ही मंजिल पर ले जाएगी।
श्रीमद्भगवद्गीता
समझ के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग रूप में अनुभव की जाती है। गीता में श्रीकृष्ण
कभी अर्जुन के स्तर पर आते हैं और कभी वे परमात्मा के रूप में प्रकट होते हैं। यह
समझने में कठिनाइयाँ पैदा करता है, खासकर
प्रारंभिक अवस्था में,
क्योंकि ये दोनों स्तर अलग-अलग प्रतीत होते हैं।
उदाहरण के लिए पिछली सदी की शुरुआत में वैज्ञानिकों को प्रकाश को समझने में
कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले यह सिद्ध हुआ कि प्रकाश एक तरंग है, बाद में यह ज्ञात हुआ कि यह एक कण की तरह भी व्यवहार करता है।
दोनों सिद्धांत एक-दूसरे के विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। लेकिन प्रकाश
विरोधाभासों का एक संयोजन है। जीवन भी ऐसा ही है और गीता को
समझते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है।
एक
और उदाहरण अंधे व्यक्तियों और हाथी का है। एक बार गाँव में एक हाथी घुस आया और कुछ
अंधे लोगों ने उसे समझने का प्रयास किया। उन्होंने हाथी के जिस भी अंग को छुआ उसके आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि हाथी कैसा होगा। हाथी की सूंड़ को
छूने वाले ने कहा कि हाथी एक लंबा और खुरदुरा प्राणी है। दांत को छूने वाले ने कहा
कि यह जानवर चट्टान की तरह सख्त है। जिसने पेट को छुआ उसने
कहा कि यह विशाल है। इस प्रकार उन लोगों ने अपने-अपने अनुमान
लगाए।
वे इस बात से अनजान
थे कि उनकी धारणाएँ समग्रता का एक अंश मात्र थीं।
एक
ही सत्य के प्रति भिन्न-भिन्न धारणाएँ ही आज संसार में दिखने वाले सभी मतभेदों का मूल
कारण हैं। हमारी मनःस्थिति भी लोगों और वस्तुओं को देखते समय वैसी ही होती है जैसी
उन अंधे लोगों की। यह अपूर्ण समझ हमें दुःख की ओर ले जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता
आंशिक समझ से पूर्ण जागरूकता की ओर जाने की यात्रा है। श्रीकृष्ण हमें आश्वस्त करते
हैं कि इस यात्रा में हमारे द्वारा उठाए गए कुछ कदम भी बहुत लाभदायक सिद्ध होंगे।
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