1. अहंकार से आरम्भ


 


श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण और योद्धा अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हुआ सात सौ श्लोकों का एक दिव्य संवाद है।

युद्ध प्रारम्भ होने से ठीक पहले अर्जुन को लगा कि इस युद्ध में उसके अनेक मित्र, गुरुजन और संबंधी मारे जाएंगे। उसने निष्कर्ष निकाला कि इसके अनेक हानिकारक और अवांछनीय परिणाम होंगे।

अर्जुन युद्धभूमि में स्वयं को और दूसरों को कर्ता के रूप में देख रहा है। वास्तव में इस दृष्टिकोण को अहंकार कहा जाता है जो ‘अहं’ (मैं) और ‘कर्ता’ से मिलकर बना है। यद्यपि हम सभी एक ही परम एकत्व के अंश हैं फिर भी अहंकार निरन्तर यह आभास कराता रहता है कि हम एक-दूसरे से भिन्न हैं।

श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ सम्पूर्ण वार्तालाप इसी अहंकार के बारे में है, चाहे वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो। इससे मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को अनेक मार्ग, मील के पत्थर और मापदंड बताते हैं। यदि हम कुरुक्षेत्र युद्ध को एक रूपक के तौर पर लें तो हम सभी अपने दैनिक जीवन में अर्जुन जैसी परिस्थितियों का सामना करते हैं। यह परिवार, कार्यस्थल, स्वास्थ्य, धन, रिश्तों आदि के संदर्भ में हो सकता है। जब तक हम जीवित हैं, ऐसी दुविधाएँ तब तक बनी रहती हैं जब तक अहंकार को समझ नहीं लिया जाता।

श्रीमद्भगवद्गीता इस बारे में है कि ‘हम कौन हैं’ न कि ‘हमारे पास क्या है’, ‘हम क्या करते हैं या ‘हम क्या जानते हैं’। यह सत्य को जानने के साथ-साथ सच्चा होने जैसा है। कोई भी सिद्धांत हमें साइकिल चलाने या तैरने में सक्षम नहीं बना सकता। इसी प्रकार कोई भी दर्शन हमारी मदद नहीं कर सकता जब तक कि हम जीवन को जागरूकता के साथ अनुभव न करें। गीता के मार्गदर्शक सिद्धांत हमें अहंकार से मुक्त अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था के गंतव्य तक पहुँचने में मदद करेंगे।

आमतौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का उपदेश दिए जाने के बाद से समय बदल गया है। निश्चित रूप से पिछली कुछ शताब्दियों में विज्ञान के विकास के कारण बहुत बदलाव आए हैं। लेकिन वास्तव में क्रमागत उन्नति के दृष्टिकोण से मानव का कोई विकास नहीं हुआ। दुविधा का आंतरिक पक्ष वही है। भले ही बाहरी रूप अलग दिखते हों, मानव के आंतरिक संघर्ष सदैव एक जैसे ही रहे हैं।

 

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