71. गुणों की परस्पर प्रक्रिया
श्रीकृष्ण
कहते हैं “वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं
तो भी जिसका अंत:करण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा
अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मानता है (3.27)। गुणविभाग और
कर्मविभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों से बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता” (3.28)।
गीता
का मूल उपदेश है कि किसी भी कार्य का कोई कर्ता नहीं होता है बल्कि गुणों के बीच
परस्पर प्रक्रिया का नतीजा है। सत्व, रजस् और तमस् ये तीन गुण
हममें से प्रत्येक में अलग-अलग अनुपात में मौजूद हैं। सत्वगुण ज्ञान के प्रति लगाव
है; रजोगुण कर्म के प्रति आसक्ति है और तमस् आलस्य की ओर ले जाता है।
यह
ध्यान देने योग्य है कि कोई भी गुण किसी अन्य गुण से श्रेष्ठ या निम्न नहीं है। वे
सिर्फ गुण हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई रजोगुण के प्रभाव
में है
तो वे कार्रवाई के प्रति गहन रूप से प्रवृत्त होकर सो नहीं
पाएंगे। जबकि सोने के लिए तमस् गुण की आवश्यकता होती है।
हमें
उस गुण से अवगत होने की आवश्यकता है जो वर्तमान समय में हम पर हावी है। उदाहरण के
लिए
तमस् के प्रभाव में, आलसी होकर व्यक्ति सोफे पर
बैठकर टीवी देखता है। यदि उनका जीवन साथी रजोगुण में हो तो
वह खरीदारी करने,
सिनेमा देखने, दोस्तों से मिलने आदि के
लिए बाहर जाना चाहेंगे। इसका परिणाम रजोगुण और तमोगुण के बीच परस्पर प्रक्रिया के
कारण होंगे। गुणों की परस्पर क्रिया से प्रेरित ऐसी ही परिस्थितियाँ कार्यस्थलों
पर भी होती हैं।
श्रीकृष्ण
समझाते हैं कि हमें गुणों को पार कर गुणातीत होना चाहिए (14.22-14.26) जो एक ऐसी स्थिति है जहाँ हम उन गुणों से अवगत होते हैं जो वर्तमान क्षण में
हम पर हावी हैं और हम भौतिक दुनिया में उनके परस्पर प्रक्रिया के केवल एक साक्षी
बनकर रहते हैं।
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