210. उनके धाम की कुंजियाँ
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“वे जो अभिमान और मोह से मुक्त हो गए हैं, जिन्होंने आसक्ति की बुराइयों पर विजय पा ली है, जो निरन्तर अपनी आत्मा और भगवान् में लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से
परे हैं, ऐसे मान और मोह रहित ज्ञानीजन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं” (15.5)। ये उनके धाम में पहुँचने के गुण हैं
और यदि एक बार हम इनको प्राप्त कर लेते हैं तो हम उनके धाम
में होते हैं। एक और संकेत यह है कि उनका धाम कहीं बाहर नहीं है बल्कि अन्दर ही है जिसे खोजा जाना बाकी
है।
श्रीकृष्ण
ने उन गुणों का वर्णन किया है जो हमें उनके धाम की यात्रा में मार्गदर्शक मील के
पत्थरों के रूप में सहायता कर सकते हैं। मैत्रीपूर्ण और दयालु होना; ममत्व रहित और निरहंकार; किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना; सुख-दुःख में समभाव रखना (सम-सुख-दुःख) और क्षमाशील होना (क्षमाशील); सदैव संतुष्ट और व्याकुलता से मुक्त रहना; ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त रहना; सभी कार्यों में अपेक्षाओं और स्वार्थ
से मुक्त रहना (12.13
से 12.16);
विनम्र और क्षमाशील होना; इन्द्रिय
विषयों के प्रति वैराग्य;
वांछनीय और अवांछनीय परिस्थितियों के प्रति अनासक्ति और
शाश्वत समभाव (13.8-13.12)
इनमें सम्मिलित हैं ।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “न तो सूर्य, न ही चंद्रमा, और न ही अग्नि मेरे उस परम धाम को प्रकाशित कर सकते हैं, जहाँ जाने के बाद, कोई कभी वापस नहीं आता” (15.6)।
किसी
न किसी रूप में
हम सभी उनके धाम के मार्ग पर हैं क्योंकि हम सभी उस आनन्द, तृप्ति और मुक्ति की खोज में हैं। हमारी सामान्य मान्यता यह है कि उनके
आशीर्वाद से हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं और संपत्ति, सफलता,
नाम और प्रसिद्धि के माध्यम से आनन्द को अधिकतम कर सकते
हैं। हालाँकि,
प्रत्येक सुख के बाद दुःख अवश्य आता है जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच निरन्तर झूलना पड़ता है। श्रीकृष्ण
कहते हैं द्वन्द्वों से मुक्ति उनके धाम की
पहचान है। उनके धाम तक पहुँचना कुछ और नहीं बल्कि इच्छाओं का त्याग और सुख-दुःख
आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठना है जो आनन्दमय जीवन है।

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