29. पानी, रेत और पत्थर पर लेखन
श्रीकृष्ण
कहते हैं सांख्ययोग (2.11-2.38)
के बारे में स्पष्ट करने के बाद वे अब योग अर्थात् कर्मयोग
की व्याख्या करेंगे,
जिसके अभ्यास से व्यक्ति कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा (2.39)।
सांख्ययोग
की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को जागरूक करते हैं
कि वह अविनाशी चैतन्य हैं जिसकी मृत्यु नहीं होती है। इसी श्लोक से श्रीकृष्ण
कर्मयोग के द्वारा इसकी व्याख्या करने लगते हैं। इसलिए कर्मबंधन और योग को इसी
सन्दर्भ में समझने की जरूरत है।
योग
का शाब्दिक अर्थ ‘मेल’ है और गीता में
इसका प्रयोग कई संदर्भों में किया गया है। श्रीकृष्ण समत्व को ही योग कहते हैं (2.48) जहाँ सफलता या असफलता के प्रति आसक्ति को छोड़ दिया जाता है। श्रीकृष्ण का जोर
सुख-दु:ख,
जीत-हार और लाभ-हानि के प्रति समत्व बनाए रखने पर है
(2.38)।
कर्मबंधन
उन सुखद या दुःखद अनुभवों और छापों का संचय है जो हमारे कर्मों और उनके परिणामों
से उत्पन्न होते हैं,
जब हम उनके प्रति आसक्ति, द्वेष
अथवा असंतुलित प्रतिक्रिया करते हैं। वैज्ञानिक रूप से इन्हें तंत्रिका प्रतिरूप (neural
pattern) कहा जाता है। दिमाग पर यह चिह्न हमारे व्यवहार को अचेतन
स्तर से संचालित करती हैं और इसलिए श्रीकृष्ण हमें योग के माध्यम से कर्मबंधन के
चिन्हों से मुक्त होने के लिए कहते हैं।
हमारी
स्वाभाविक प्रवृत्ति उन संस्कारों के प्रति आकर्षित होती है जो सुख और लाभ से
जुड़े होते हैं
तथा उन संस्कारों के प्रति द्वेष उत्पन्न करती है जो दुःख
और हानि से जुड़े हों। ये संस्कार जितने गहरे होते हैं, राग और द्वेष की तीव्रता भी उतनी ही अधिक होगी ।
उदाहरण
के तौर पर दिमाग पर इन चिन्हों या छापों को पत्थर, रेत
और पानी पर लिखावट से तुलना कर सकते है। जब छाप पत्थर पर होती है तो यह गहरी होती है और हमें लंबे समय तक प्रभावित करती है। रेत पर लिखने से
थोड़ा कम समय तक। परन्तु पानी पर लिखा तुरंत मिट जाता है।
जब
श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मयोग हमें कर्मबंधन से मुक्त कर देता है और हमें इतना सरल, सहज तथा कोमल बना देता है कि कोई भी घटना हमें विचलित या प्रभावित नहीं कर
पाती, तो इसका संकेत जल पर बनने वाले चिन्हों की उपमा की ओर है।
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