28. संतुलन ही परमपद
श्रीकृष्ण
अर्जुन से कहते हैं कि यदि वह सुख और दु:ख, लाभ और हानि, और जय और पराजय को समान समझकर युद्ध करेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह
एक महत्वपूर्ण श्लोक है और इसमें गीता का पूरा सार है।
यह
श्लोक बस इतना कहता है कि हमारे सभी कर्म प्रेरित हैं और यही प्रेरणा कर्म को
अशुद्ध या पापयुक्त बनाती है। हम शायद ही कोई ऐसा कर्म करते हैं जो सुख, लाभ या जीत पाने के लिए या दु:ख, हानि या हार से बचने के
लिए होते हैं।
सांख्य
और कर्मयोग की दृष्टि से किसी भी कर्म को तीन भागों में बांटा जा सकता है जो कर्ता, कर्म और कर्मफल हैं। श्रीकृष्ण ने कर्मफल को सुख/दु:ख, लाभ/हानि और जय/पराजय में विभाजित किया है।
श्रीकृष्ण
इस श्लोक में समत्व प्राप्त करने के लिए कर्ता, कर्म और कर्मफल को अलग
करने का संकेत दे रहे हैं। एक तरीका यह है कि कर्तापन को छोड़कर साक्षी बन जाएं, इस एहसास से कि जीवन रूपी नाटक में हम एक छोटी सा भूमिका निभाते हैं। दूसरा
तरीका यह महसूस करना है कि कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह हमारे
प्रयासों के अलावा कई कारकों का एक संयोजन है। कर्तापन या कर्मफल छोड़ने के मार्ग
आपस में जुड़े हुए हैं और एक में प्रगति स्वत: ही दूसरे में प्रगति लाएगी।
कर्म
की बात की जाए तो
यह हममें से किसी के भी धरती पर आने से बहुत पहले मौजूद था।
न तो इसपर हमारा स्वामित्व हो सकता है और न ही इसके परिणामों को नियंत्रित किया जा
सकता है।
इस
श्लोक को भक्तियोग की दृष्टि से भी देखा जा सकता है जहाँ भाव ही सब कुछ है।
श्रीकृष्ण कर्म से अधिक भाव को प्राथमिकता देते हैं। यह आंतरिक समर्पण स्वत: ही
समत्व लाता है।
व्यक्ति
की अपनी मनोदशा के आधार पर अपना मार्ग स्वयं चुन सकता
है। दृष्टिकोण कुछ भी हो,
केवल इस श्लोक का ध्यान करने से व्यक्ति अहंकार से मुक्त
अंतरात्मा को प्राप्त कर सकता है।
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