31. मानसिक शांति की आधारशिला
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“कर्मयोग में बुद्धि निश्चयात्मिका होती
है और जो अस्थिर हैं उनकी बुद्धि बहुत भेदोंवाली होती है” (2.41)।
समत्व
ही योग है -अर्थात् जीवन में अनुभव होने वाले द्वन्द्वों जैसे सुख-दुःख, जय-पराजय और लाभ-हानि के बीच संतुलन बनाए रखना (2.48
एवं 2.38)। कर्मयोग इन ध्रुवों को पार करने का मार्ग है जो
अंतत: एक निश्चयात्मिका बुद्धि में परिणत होता है। दूसरी ओर एक
अस्थिर बुद्धि हमें मानसिक शांति से वंचित कर देती है।
हमारी
सामान्य धारणा यह है कि जब हम सुख, जीत और लाभ प्राप्त करते
हैं तब मन की शांति अपने आप आ जाती है, लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं
कर्मयोग के अभ्यास से उत्पन्न एक निश्चयात्मिका बुद्धि हमें द्वन्द्वों को पार
करने में मदद करके मानसिक शांति देती है।
अस्थिरबुद्धि
हर परिस्थिति,
परिणाम और व्यक्ति को शुभ-अशुभ, अच्छा-बुरा मानकर उसका वर्गीकरण करती रहती है। हमारा व्यवहार ऐसे विभाजनों से बहुत
ज्यादा प्रभावित होता है। अपने कार्यस्थल पर हम
एक मापदंड अपने से नीचे के लोगों पर और दूसरा अपने से ऊपर के लोगों पर
लागू करते हैं। परिवार में भी विभिन्न परिस्थितियों का सामना करते हुए अलग-अलग मापदंड
लागू करते हैं
जहाँ प्रियजनों के लिए कुछ नियम होते हैं और दूसरों के लिए कुछ
और होते हैं। इसे देखकर बच्चों में समत्व विकसित नहीं हो पाता है।
अपने
दैनिक जीवन में हम धर्म,
जाति, राष्ट्रीयता, लिंग आदि जैसे सामुदायिक मान्यताओं के शिकार होते हैं। वे हमारे दिमाग में छोटी
उम्र में डाले गए थे और वे लम्बे समय तक हमें विभाजित करते रहते हैं। ये सामुदायिक
मान्यताएँ हमें अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं।
अविवेकपूर्ण बुद्धि के कारण हम अपनी भूलों को परखने के लिए एक प्रकार का औचित्य ढूँढते हैं जबकि दूसरों की गलतियों को जाँचने के लिए अलग मानदंड अपनाते हैं। सहायता माँगते
समय और सहायता देते समय भी हम अलग-अलग पैमाने अपनाते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं कर्मयोग के मार्ग पर चलने से समत्व के
योग्य एक निश्चयात्मिका बुद्धि प्राप्त होती है जो मानसिक शांति की आधारशिला है।
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