57. आध्यात्मिक जागरण


 

श्रीकृष्ण कहते हैं सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में संयमी योगी जागता है और जिन नाशवान् सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिये वह रात्रि के समान है (2.69)। लाक्षणिक दृष्टि से यह श्लोक ‘शारीरिक रूप से जाग्रत लेकिन आध्यात्मिक रूप से सोए हुए’ और इसके विपरीत होने के विचार को सामने लाता है। इसके अलावा यह शाब्दिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।

जीने के दो तरीके हैं । पहला वह है जहाँ हम अपने सुखों के लिए इन्द्रियों पर निर्भर हैं और दूसरा वह है जहाँ हम इन्द्रियों से स्वतंत्र हैं और वे हमारे नियंत्रण में रहती हैं। पहली श्रेणी के लोगों के लिए जीने का दूसरा तरीका एक अज्ञात दुनिया होगी और रात इस अज्ञानता का रूपक है।

जब हम किसी एक इन्द्रिय-उपकरण का उपयोग कर रहे होते हैं तब हमारा ध्यान कहीं और होता है। इसका अर्थ है कि हम उसका उपयोग तो कर रहे हैं परन्तु जागरूकता के साथ नहीं बल्कि यांत्रिक रूप से कर रहे हैं। उदाहरण के लिए खाना खाते समय हमारा ध्यान प्रायः खाने पर नहीं होता है। यह फोन पर बातचीत, अखबार या टीवी हो सकते है क्योंकि हम एक समय पर एकाधिक कार्य करने पर विश्वास करते हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि आध्यात्मिकता उतनी ही सरल है जितनी कि हम खाते समय खायें; प्रार्थना करते समय प्रार्थना करें। यह श्लोक इंगित करता है कि जो वर्तमान क्षण में रहता है उस व्यक्ति के लिए यह दिन है, अन्यथा रात।

तीसरी व्याख्या शाब्दिक है। जब हम सोते हैं तो हमारा एक हिस्सा हमेशा जागता है, जैसे सोई हुई मां का एक हिस्सा हमेशा उसके बगल में सो रहे बच्चे के लिए जागता है; जैसे बहुत से लोग शयनगृह में सो रहे होते हैं और जैसे ही जिसका नाम पुकारा जाता है वह उठ जाता है। इसका मतलब यह है कि हम सभी को समान रूप से इस क्षमता से नवाजा गया है कि हम अपने एक हिस्से को हर समय जगाए रखें।

यह श्लोक इंगित करता है कि हमें अपने उस हिस्से को बढ़ाना चाहिए जो हमारे सभी कार्यों के प्रति जागरूक है, यहाँ तक कि कोई अपनी नींद को भी देख सके।


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