59. अहंकार से बचो
श्रीकृष्ण
ने देखा कि अर्जुन ‘अहं कर्ता’ यानी अहंकार की भावना से अभिभूत है और यह उसके
विषाद का कारण है। अहंकार के प्रति जागरूकता हमें उसे पार करने में सहायता करेगी।
अहंकार
के कई रूप हैं। गर्व अहंकार का ही एक रूप है। जब कोई व्यक्ति सफलता/जीत/लाभ के सुख
से गुजरता है तो उस अहंकार को अभिमान कहा जाता है और जब कोई विफलता/हार/हानि की
पीड़ा से गुजरता है तो उस अहंकार को उदासी, दु:ख, क्रोध कहा जाता है। जब हम दूसरों को सुखी देखते हैं तो यह ईर्ष्या है और जब हम
दूसरों को दु:खी देखते हैं तो यह सहानुभूति है।
अहंकार
हम पर हावी होता है जब हम भौतिक संपत्ति एकत्र कर रहे होते हैं और जब हम उनको दान करते
हैं तब भी वह मौजूद होता है। यह संसार में कर्म करने के लिए और संन्यास लेने के
लिए भी प्रेरित करता है। यह बनाने के पीछे तो है, साथ
ही बिगाड़ने के पीछे भी है। यह ज्ञान में भी है और अज्ञान में भी।
प्रशंसा
अहंकार को बढ़ावा देती है और आलोचना पीड़ा देती है जिसकी वजह से हम दूसरों के छल
का शिकार हो जाते है। संक्षेप में अहंकार किसी न किसी अर्थ
में हर भावना के पीछे छिपा होता है जो हमारे बाहरी व्यवहार को प्रभावित करता है।
अहंकार हमें सफलता और समृद्धि की ओर ले जाता प्रतीत हो सकता है लेकिन यह अस्थायी रूप से नशे में धुत्त होने जैसा है।
‘मैं’ और ‘मेरा’
अहंकार की नींव हैं और दैनिक बातचीत और विचारों में इन शब्दों के प्रयोग से बचने
से हम काफी हद तक अहंकार को कमजोर कर सकते है।
निमित्त
मात्र होने का अर्थ यह समझना है कि हम परमात्मा के हाथों में केवल एक साधन हैं। इस
अवस्था में यह स्पष्ट होता है कि कर्मों का वास्तविक कर्ता परमात्मा है और हम केवल
उसके हाथों में एक उपकरण हैं जिसके माध्यम से कर्म घटित
होते हैं। यह समझ हमें अहंकार के बंधन से मुक्त होने में सहायता करती है।
अहंकार
का जन्म तब होता है जब हम किसी न किसी ध्रुव के साथ पहचान करते हैं। इसीलिए श्लोक 2.48 में श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देतें हैं कि वह मध्य में विकल्पहीन रहे जहाँ
अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है। भूख लगने पर भोजन करें, ठंड लगने पर गर्म वस्त्र धारण करें, आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष
करें, और परिस्थिति के अनुसार भावनाओं का उपयोग करें; किन्तु
उनमें से किसी के साथ तादात्म्य स्थापित न करें।

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