45. स्थिर बुद्धि
हमारे जीवन के सामान्य क्रम में जब हम एक ही विषय पर परस्पर विरोधी राय सुनते
हैं
तो हम भ्रमित हो जाते हैं -चाहे वह समाचार, दर्शन,
दूसरों की मान्यताएँ आदि हों। श्रीकृष्ण कहते हैं हम योग
तभी प्राप्त करेंगे जब विभिन्न मतों को सुनने के बावजूद बुद्धि निश्चल और समाधि
में स्थिर रहेगी (2.53)। श्रीकृष्ण ‘श्रवण’ को एक रूपक के रूप में प्रयोग करते हैं और यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू होता है।
इस
श्लोक के लिए सबसे अच्छा उदाहरण एक पेड़ है जिसका ऊपरी भाग दिखाई देता है और निचला
भाग इसका अदृश्य जड़ है। हवाओं की ताकत के आधार पर शाखाएँ और पत्तियाँ हिलती-डुलती
रहती हैं
जबकि दूसरी ओर जड़ प्रणाली इनसे प्रभावित नहीं होती है। इसका
अभिप्राय यह है कि आंतरिक भाग समाधि की तरह निश्चल रहता है और स्थिरता के साथ-साथ
पोषण प्रदान करने का अपना कर्तव्य निभाता रहता है। यह पेड़ के लिए योग के समान है
जहाँ बाहरी भाग कम्पन करता है और आंतरिक भाग निश्चल रहता है।
अज्ञान
की अवस्था में हमारा मन चंचल होता है जो बाहरी उत्तेजनाओं से स्वतः ही प्रभावित
होता है। बाहरी दुनिया को ये प्रभाव तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के रूप में दिखाई
देते हैं। समय के साथ कुछ लोग जीवन के अनुभवों से इन बाहरी प्रभावों को दबाना सीख
जाते हैं ताकि वे स्वयं को एक सुखद और मनभावन व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत कर सकें। इस
अवस्था में आंतरिक अशांति बनी रहती है परंतु व्यक्ति एक साहसी या
सुखद बाहरी रूप दिखाना सीख लेता है जो अधिक समय तक टिक नहीं पाता।
इस
श्लोक में
श्रीकृष्ण निश्चल समाधि की स्थिति की बात करते हैं जहाँ यह प्रभाव
भीतर भी मौजूद नहीं होते। दूसरे शब्दों में यह एक अहसास है कि ये
बाहरी प्रभाव अनित्य हैं और हमें अंतरात्मा के साथ जुड़ना चाहिए जो निश्चल समाधि में
होता है (2.14)। इस अवस्था में मन बुद्धि द्वारा नियंत्रित होता है न कि इन्द्रियों के द्वारा।
यह
श्लोक मानसिक धारणाओं की ओर इंगित करता है जिनके कारण एक ही परिस्थिति
की व्याख्या भिन्न-भिन्न व्यक्ति अलग-अलग प्रकार से करते हैं। यही वह भ्रम है जो हमें सर्वत्र दिखाई देता है।

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