44. क्या हमारा है, क्या नहीं
श्रीकृष्ण
कहते हैं “जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल को भलीभांति पार कर जायेगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों
से वैराग्य (निर्वेद) को प्राप्त हो जायेगा” (2.52)। इसका तात्पर्य यह है कि जब हम मोह पर विजय प्राप्त कर लेते हैं तब हमारी इंद्रियाँ हमें प्रभावित नहीं करती हैं। श्रीकृष्ण ने यहाँ सुनने को
रूपक के रूप में चुना क्योंकि हम प्रायः दूसरों के शब्दों
जैसे प्रशंसा, आलोचना, गपशप आदि से प्रभावित होते हैं।
शब्दों
के अभाव के कारण
अहंकार की तरह मोह का वर्णन करना भी मुश्किल है। मूल रूप से क्या हमारा है और क्या नहीं के बीच अंतर करने की हमारी अक्षमता ही मोह है। यह भौतिक
संपत्ति और भावनाओं का स्वामित्व है जबकि वास्तव में हम इनके मालिक
नहीं होते हैं। हम उस चीज से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं जो हमारी नहीं है जबकि हमें इस बारे में कोई पता नहीं होता कि हम देही/आत्मा हैं। श्रीकृष्ण इस
घटना को ‘कलिलं’ या आध्यात्मिक अंधकार कहते हैं।
श्रीकृष्ण
आगे कहते हैं कि जब हम इस अंधकार को पार करते हैं तो हम ‘निर्वेद’ की अवस्था प्राप्त
करते हैं। यद्यपि निर्वेद को उदासीनता के रूप में वर्णित किया गया है, यह निष्क्रिय या नकारात्मक उदासीनता नहीं है जो अज्ञानता से पैदा होती है। यह
उदासीनता
वर्तमान में जीने से उत्पन्न होने वाली जागरूकता है। यह न
तो आसक्ति है और न विरक्ति बल्कि दोनों से परे है। यह
बिना विभाजन के सकारात्मक स्वीकृति है।
दूसरों
पर आश्रित जीवन में हम अपनी संपत्ति, क्षमताओं,
उपलब्धियों, व्यवहार आदि के लिए उनसे स्वीकार्यता
और प्रशंसा की आशा करते हैं। हम इन सुखद संवेदनाओं को प्राप्त करने के लिए जीवन भर
कड़ी मेहनत करते रहते हैं जब तक कि हम मोह को जागरूकता के माध्यम से दूर करने में
सक्षम नहीं हो जाते।
एक
बार जब हम संतुलित और सुसंगत बुद्धि के माध्यम से मोहरूप अंधकार को पार कर जाते
हैं
तो बाह्य परिस्थितियाँ हमें प्रभावित नहीं कर पाएंगी।

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