185. अति प्रिय भक्त
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा
ममता से रहित,
अहंकार से रहित, सुख-दुखों
की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है; तथा
जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है -वह
मुझमें अर्पण किए हुए मनबुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है” (12.13 - 12.14)।
यह
श्रीकृष्ण के पहले के आश्वासन के विपरीत प्रतीत होता है जहाँ उन्होंने कहा कि उनके
लिए कोई भी द्वेष्य नहीं है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। जबकि उनका आशीर्वाद
वर्षा की तरह सभी के लिए उपलब्ध है, इन गुणों को प्राप्त करना
अपने कटोरे को सीधा रखने जैसा है।
‘किसी
से द्वेष नहीं करना’ भगवद्गीता का मूल उपदेश है। पहले
श्रीकृष्ण ने द्वेष को त्यागकर कर्म करने की सलाह दी थी (5.3)। जब द्वेष हमारा एक
हिस्सा बन जाता है
तो इसे छोड़ना दुःखदायक हो जाता है क्योंकि यह हमारे एक अंग
को खोने जैसा है। यह एक हानिकारक कैंसरयुक्त ट्यूमर (tumour)
को हटाने जैसा है जिसे हटाते समय भी हमें
दर्द होता है।
दूसरी
ओर,
द्वेष को छोड़ना आवश्यक है क्योंकि यह हमारे व्यवहार और
कार्यों को प्रभावित करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं ‘क्षमा’ उन्हीं से उत्पन्न गुण
है (10.4) और यह दैवी प्रकृति वाले व्यक्ति की अमूल्य संपदा है (16.3)। क्षमा घृणा
का सबसे प्रभावी उपचार है। इसके लिए साहस, सजगता और करुणा की आवश्यकता होती है। साथ ही, यह समझ भी आवश्यक है कि इस जगत् में कोई भी कर्ता नहीं है; इसलिए हमें अपने दुःख और आघात के लिए किसी को दोष देने की आवश्यकता नहीं है।
क्षमा घृणा को खत्म करके मन में शांति लाती है।
समत्व
का विकास करना द्वेष को दूर करने का एक अन्य मार्ग है। समत्व का अर्थ केवल सभी
लोगों के साथ समान व्यवहार करना नहीं है; बल्कि
यह पहचानना है कि लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और भय जैसी मानवीय प्रवृत्तियाँ हम सभी में विद्यमान हैं, यद्यपि उनकी मात्रा और अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न हो सकती है। अक्सर दूसरों में
जो बात हमें विचलित करती है या अप्रिय लगती है वह
हमारे भीतर उपस्थित किसी ऐसी प्रवृत्ति का प्रतिबिंब होती है जिसे हमने अभी तक
पहचाना या स्वीकार नहीं किया है। हमारा द्वेष केवल दूसरों में दिखाई देने वाली
बातों से नहीं उत्पन्न होता बल्कि उन पहलुओं से भी
उत्पन्न होता है जिन्हें हम स्वयं अपने भीतर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।

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