186. जियो और जीने दो

 

श्रीकृष्ण कहते हैंजो भक्त संसार को उद्विग्न नहीं करता और स्वयं भी संसार से उद्विग्न नहीं होता; जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और उद्वेग से मुक्त है; मेरे ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं। वे जो आकांक्षा से रहित है, बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध, दक्ष, संसार के प्रति उदासीन हैं और सभी कर्मों में स्वार्थ रहित रहते हैं, ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं” (12.15 और 12.16)। ‘न स्वयं उद्विग्न होना और न दूसरों को उद्विग्न करना’ जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है।

श्रीकृष्ण ने पहले ही इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि हम विचलित क्यों हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब इन्द्रियाँ इन्द्रिय विषयों से मिलती हैं जैसे कि जब कान हमारी प्रशंसा या आलोचना सुनते हैं तो हमारे अन्दर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। उन्होंने हमें सलाह दी कि हम उन द्वन्द्वों को सहन करना सीखें क्योंकि वे अनित्य हैं (2.14)। ये द्वंद्व और कुछ नहीं बल्कि वे उद्वेग हैं जिन्हें हम महसूस करते हैं।

हमारे दैनिक जीवन में उद्वेग ‘जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालने’ (passing the buck) के खेल की तरह चलती रहती है। उदाहरण के लिए हम कार्यस्थल पर किसी उच्च अधिकारी से उद्वेग (तनाव) पाकर किसी निचले कर्मचारी पर या परिवार के किसी सदस्य पर निकाल देते हैं। किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं न तो स्वयं उद्विग्न होना चाहिए और न ही दूसरों को उद्विग्न करना चाहिए।

श्रीकृष्ण ने समुद्र और नदियों का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे नदियों के उसमें प्रवेश करने पर भी समुद्र अचल रहता है वैसे ही जो व्यक्ति इच्छाओं या उद्वेग से अप्रभावित रहता है वही शांति को प्राप्त करता है (2.70)। हालाँकि समुद्र अपने अन्दर प्रवेश करने वाले पानी से विचलित नहीं होता है वह इस पानी को बादलों के रूप में वापस कर देता है जिसे श्रीकृष्ण ने यज्ञका एक निस्वार्थ कर्म बताया है। जब हम निष्काम कर्म के मार्ग पर चलते हैं तब हमारे जीवन में उद्वेग का कोई स्थान नहीं रहता।

जागरूकता हमें स्वयं को उद्वेग से मुक्त करने में सहायता करती है जबकि करुणा यह सुनिश्चित करती है कि हम दूसरों में उद्वेग उत्पन्न न करें। इसीलिए कहा जाता है कि जागरूकता और करुणा आध्यात्मिक यात्रा में नाव के दो पतवार हैं।

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