155. परमात्मा को अहंकार का समर्पण
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“तुम जो कुछ भी करते हो, जो कुछ भी खाते हो वह मुझे अर्पण करके करो” (9.27)। इन्द्रियों और इन्द्रिय वस्तुओं के परस्पर प्रक्रिया के दौरान
उत्पन्न दुःख और सुख के द्वन्द्वों के बारे में हमें जागरूक होना चाहिए (2.14)।
श्रीकृष्ण इन सुखों और दुःखों को सहन करने की सलाह देते हैं क्योंकि ये अनित्य
हैं। यह सांख्ययोग का दृष्टिकोण है। खाने का उदाहरण देते हुए श्रीकृष्ण सुख-दुःख के
द्वन्द्वों को उनको समर्पित करने के लिए कहते हैं। यह भक्तियोग का दृष्टिकोण है।
ये दोनों मार्ग द्वन्द्वों को पार करके द्वंद्वातीत बनने में मदद करते हैं।
हमारे
अन्दर का रंजिश और द्वेष हमारे दुःख का मुख्य कारण है। यह तब विकसित होता है जब
लोग अपने शब्दों और कार्यों से हमें दुःख पहुँचाते हैं या जब दूसरे हमारी मदद या
उपकार का आभार नहीं मानते। घृणा का मूल कारण हमारी यह धारणा है कि हमारे साथ-साथ दूसरे
लोग भी कर्ता हैं जिससे अहंकार पैदा होता है। वास्तव में हमारे गुण सभी कार्यों के
असली कर्ता हैं। अपने को और दूसरों को कर्ता मानने से रंजिश और द्वेष का कर्मबंधन
पैदा होता है
और हम जीवन भर के लिए ‘दूसरों’ से बंध जाते हैं। इस पर काबू पाने के लिए श्रीकृष्ण
ने हमें कर्म करते समय द्वेष का त्याग करने की सलाह दी थी (5.3)। क्षमा जैसे दैवी
गुण (16.3)
को विकसित करके हम द्वेष का त्याग कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण
कहते हैं हम जो कुछ भी करते हैं उसे उन्हें समर्पित करते
हुए करें। इसका अर्थ यह है कि कर्म करते समय हमें अपने कर्तापन के भाव को भगवान्
को समर्पित करना है अर्थात् परमात्मा को अपना अहंकार समर्पित कर देना है।
श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि इसे आचरण में लाने से हम कर्मबंधन से मुक्त हो
जाएंगे (9.28)। इस परम स्वतंत्रता (मोक्ष) की अवस्था में दुनिया की कोई भी वस्तु या
स्थिति हमें असंतुलित नहीं कर सकती।
निमित्त-मात्र की अवस्था में ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव यानी अहंकार विलीन होने
लगता है। तब यह स्पष्ट होता है कि कर्मों का वास्तविक कर्ता परमात्मा है और हम
केवल उसके हाथों में एक उपकरण हैं जिसके माध्यम
से कर्म घटित होते हैं।
आध्यात्मिक
यात्रा में हमारी प्रगति को मापना एक कठिन काम है क्योंकि न तो हमारा और न दूसरों
का बाहरी व्यवहार इसका कोई सूचक है। बाहरी दुनिया की घटनाओं के कारण हमारे अन्दर
उत्पन्न होने वाली घृणा और रंजिश ही कर्मबंधन हैं। घृणा और रंजिश का अभाव आध्यात्मिक
मार्ग में हमारी प्रगति को दर्शाता है।

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