179. बदलते लक्ष्य

 


मानसिक अस्पताल में काम करने वाला एक डॉक्टर अपने एक दोस्त को अस्पताल दिखाने ले गया। उसके दोस्त ने एक कमरे में एक आदमी को एक महिला की तस्वीर के साथ देखा और डॉक्टर ने बताया कि वह आदमी उस महिला से प्यार करता था और जब वह उससे शादी नहीं कर सका तो मानसिक रूप से अस्थिर हो गया। अगले कमरे में उसी महिला की तस्वीर के साथ एक और आदमी था और डॉक्टर ने बताया कि उससे शादी करने के बाद वह मानसिक रूप से अस्थिर हो गया। यह विडम्बना से भरी हुई कहानी बताती है कि पूर्ण और अपूर्ण इच्छाओं के एक जैसे विनाशकारी परिणाम कैसे हो सकते हैं।

अर्जुन के साथ भी यही हुआ। भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय विश्वरूप दर्शन योगके प्रारंभ में वह श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखा तो वह भयभीत हो गए। चिंतित अर्जुन अब श्रीकृष्ण को उनके मानव रूप में देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। इसी तरह जीवन में हमारा लक्ष्य समय के साथ बदलता रहता है।

श्रीकृष्ण अपना विश्वरूप दिखाते हैं जिसमें अर्जुन देखते हैं कि उसके सभी शत्रु मृत्यु के मुंह में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीकृष्ण उन्हें बताते हैं कि अर्जुन सिर्फ एक निमित्त-मात्र हैं और उनको बिना तनाव के लड़ने के लिए कहते हैं। अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं इस रूप को वेद, दान या अनुष्ठान के माध्यम से नहीं देखा जा सकता है बल्कि केवल भक्ति के माध्यम से ही कोई व्यक्ति उनतक पहुँच सकता है।

अज्ञान की अवस्था में मनुष्य भौतिक वस्तुओं के संचय में संतुष्टि की खोज करता है। जब जागरूकता की किरण आती है तो व्यक्ति पुण्य जैसा कुछ उच्च प्राप्त करने के लिए दान करना शुरू कर देता है जो आमतौर पर मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने के लिए होता है। जब श्रीकृष्ण कहते हैं दान मदद नहीं कर सकता तो वे दान, वेद, अनुष्ठान से आगे बढ़ने और भक्ति के माध्यम से उन तक पहुँचने की सलाह देते हैं।

यह एक सीढ़ी के समान है -जहाँ दान, वेद और कर्मकाण्ड सीढ़ी के चरण हैं किन्तु वे स्वयं मंजिल नहीं हैं। परमात्मा तक पहुँचने के लिए अंतिम चरण के रूप में भक्ति से गुजरना पड़ता है।    


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