50. समेटना ही बुद्धिमानी
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा
लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है” (2.58)। यह इन्द्रिय-नियंत्रण पर दिए गए जोर का ही विस्तार है और यह श्लोक
व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
श्रीकृष्ण
इन्द्रियों के नियंत्रण पर जोर देते हैं क्योंकि ये इन्द्रियाँ हमारी अंतरात्मा और
बाहरी दुनिया के बीच के द्वार हैं। वे सलाह देते हैं कि जब हमें लगे कि हम विषय-वस्तुओं
से आसक्त हो रहे हैं तो हमें अपनी इन्द्रियों को उसी प्रकार
समेट लेना चाहिए जैसे कोई कछुआ संकट के समय अपने अंगों को समेट लेता है।
प्रत्येक इन्द्रिय के दो भाग होते हैं।
पहला है इन्द्रिय-उपकरण, जैसे नेत्रगोलक
और दूसरा है मस्तिष्क का वह नियंत्रक भाग जो उस नेत्रगोलक को
संचालित करता है।
संवेदी
संपर्क दो स्तरों पर होते हैं। पहला स्तर है इन्द्रिय-वस्तुओं की हमेशा बदलती बाहरी
दुनिया और इन्द्रिय-उपकरण जैसे नेत्रगोलक के बीच। यह पूरी तरह स्वचालित होता है जहाँ फोटॉन नेत्रगोलक तक पहुँचते हैं और अपनी भौतिक विशेषताओं के अनुसार प्रतिक्रिया
करते हैं। दूसरा स्तर है नेत्रगोलक और मस्तिष्क में उसके नियंत्रक भाग के बीच।
‘देखने
की इच्छा’ ही नेत्र के विकास का कारण है और यह इच्छा अभी भी इन्द्रिय के नियंत्रक भाग
में विद्यमान रहती है। इसे प्रेरित धारणा कहते हैं जिसमें हम वही देखते हैं जो हम देखना
चाहते हैं और वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। उदाहरण के लिए फुटबॉल के खेल में
हम आमतौर पर विपक्ष के पक्ष में किए गए अधिक निर्णयों को ध्यान से देखते हैं और निष्कर्ष
निकालते हैं कि अंपायर पक्षपाती है।
जब
श्रीकृष्ण इन्द्रियों का उल्लेख करते हैं तो वे उस नियंत्रक भाग
की ओर संकेत कर रहे हैं जो इन्द्रियों में इच्छा उत्पन्न करता है। इसलिए भले ही हम अपने इन्द्रियों को शारीरिक रूप से बंद कर लें, मन अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करके हमारी इच्छाओं को जीवित रखता है क्योंकि मन इन सभी नियंत्रक भागों का सम्मिलन है।
इस
वैज्ञानिक श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण हमें यह मार्गदर्शन दे रहे हैं कि हम
इन्द्रियों के नियंत्रक को उनके भौतिक पक्ष से अलग करना सीखें ताकि उत्तेजक या
निराशाजनक बाह्य परिस्थितियों से मुक्त होकर परम स्वतंत्रता (मोक्ष) को प्राप्त कर
सकें। इस अलगाव की कला में निपुण होना ही बुद्धिमानी है -यह जानकर कि कब
इन्द्रियों को समेटना है।

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