32. वेदों के पार
एक
बार
कुछ दोस्त यात्रा कर रहे थे और उन्हें एक चौड़ी नदी पार
करनी थी। उन्होंने एक नाव बनाई और नदी को पार किया। फिर उन्होंने अपनी बाकी यात्रा
के लिए भारी नाव को ढोकर अपने साथ ले जाने का फैसला किया, यह सोचकर कि यह उपयोगी होगी। इसके चलते उनका सफर धीमा और कष्टदायक हो गया।
यहाँ नदी दु:ख की ध्रुवता है और नाव दु:ख को दूर करने का एक साधन है।
इसी
तरह
हमें अपने दैनिक जीवन में सामना करने वाली दुःखों से राहत
देने के लिए कई तंत्र और अनुष्ठान हैं। वेद (ज्ञान) दु:ख से राहत देने के लिए कई
अनुष्ठानों का वर्णन करते हैं और इनमें से कई अनुष्ठान आज भी उपलब्ध हैं और किए जा
रहे हैं। स्वास्थ्य,
व्यापार, कार्य या परिवार से जुड़ी कठिनाइयों का
सामना करते समय इन अनुष्ठानों का सहारा लेना हमें स्वाभाविक और तर्कसंगत प्रतीत होता
है।
श्रीकृष्ण
अर्जुन को कहते हैं कि वेदों का बाहरी अर्थ बताकर इस जीवन और परलोक (स्वर्ग) दोनों
में सुख का वादा करने वाले मूर्खों के शब्दों में नहीं फंसना चाहिए (2.42-2.46)। वह उसे द्वंद्वातीत और गुणातीत होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ताकि वह आत्मवान्
बन जाए (2.45)। जब बड़ा सरोवर मिल जाता है तो उसे छोटे तालाब की जरूरत नहीं होती और इसी तरह
आत्मवान् के लिए वेद उस छोटे तालाब के समान हैं (2.46)।
बुद्धिमानी
इसी में है कि आगे की यात्रा में नाव का बोझ अपने साथ न ढोया जाए। उसी तरह सुख और सत्ता की प्राप्ति के प्रयासों की निरर्थकता को समझ लेने के बाद वेदों
के बाह्य अर्थ तक सीमित न रहना ही सच्ची प्रज्ञा है।
गीता
के शुरुआत में ही
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इन्द्रियाँ सुख-दु:ख जैसे द्वन्द्वों
को पैदा करती हैं और उनको सहन करने के लिए कहते हैं क्योंकि वे अनित्य हैं (2.14)। इन्हें पार करने और इन क्षणिकाओं को द्रष्टा बनकर देखने पर उनका जोर है।
श्रीकृष्ण बनावटी सुख के बजाय प्रामाणिक आनन्द के पक्ष में हैं।
श्रीकृष्ण
ऐसे आनंद की ओर संकेत करते हैं जो स्वाभाविक, निरपेक्ष और बाहरी
परिस्थितियों से स्वतंत्र होता है। इसके विपरीत, इन्द्रियों
और उनके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख क्षणिक होता है और अंततः दुःख में परिणत
होता है।
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