153. भिक्षापात्र को तोड़ना
श्रीकृष्ण
कहते हैं वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश करने की अपनी
इच्छा को पूरा करते हैं और दिव्य सुखों का आनन्द लेते हैं (9.20)। अपने पुण्य के
क्षीण होने पर वापस आते हैं और बार-बार आवागमन के इस चक्र में यात्रा करते रहते
हैं (9.21)।
सामान्य
व्याख्या यह है कि वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से प्राप्त पुण्य हमें जीवन के बाद
स्वर्ग में ले जाते हैं और जब पुण्य क्षीण हो जाते हैं तो हम वापस आते हैं। एक और
व्याख्या संभव है
यदि इच्छाओं की पूर्ति से संतुष्टि प्राप्त करना स्वर्ग में
प्रवेश के रूप में लिया जाता है। अज्ञान के कारण हम लोगों और भौतिक संपत्तियों की
प्राप्ति के द्वारा अपनी इच्छाओं को पूरा करके संतुष्ट होने के लिए वैदिक
अनुष्ठानों पर निर्भर रहते हैं। इस मार्ग में व्यक्ति
बार-बार दुःख पाता है क्योंकि बदलती परिस्थितियों से उसे कभी भी शाश्वत संतुष्टि
नहीं मिल सकती है। संतुष्टि केवल अपरिवर्तनीय आत्मा से ही प्राप्त होता है।
इसके
अलावा,
प्रकृति का नियम है कि हर चीज अपने ध्रुवीय विपरीत के साथ
मौजूद होती है जिसे द्वंद्व कहते हैं। यदि स्वर्ग को सुख ध्रुवता की अनुभूति के
रूप में लिया जाता है तो समय के साथ हम दुःख की ध्रुवता का
अनुभव करेंगे। ये स्थितियाँ स्वर्ग से
वापसी के अलावा और कुछ नहीं हैं।
श्रीकृष्ण आश्वासन देते हुए एक मार्ग सुझाते हैं कि जो लोग किसी और चीज के बारे में सोचे बिना निरन्तर मुझे स्मरण करते हुए मेरे साथ जुड़े रहते हैं, मैं उन्हें योग और क्षेम प्रदान करता हूँ -योगः क्षेमं वहाम्यहम् (9.22)। यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है जिसमे श्रीकृष्ण उन भक्तों को जो उनकी ओर इच्छा रहित मार्ग पर चलते हैं उनको क्षेम के साथ-साथ योग प्रदान करते हैं।
यह
स्वयं के साथ संतुष्टि का मार्ग है जिसे सांख्ययोग में स्थितप्रज्ञ कहा गया है
(2.55)
जहाँ व्यक्ति अपना भिक्षापात्र तोड़कर सभी इच्छाओं को त्याग
देता है। भक्तियोग के दृष्टिकोण से यह भक्तों का इच्छा रहित
समर्पण है जहाँ भगवान् उनकी रक्षा करते हैं और हर तरह से ध्यान रखते हैं।

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