6. संकल्प को पहचानें
गीता आंतरिक जगत् में सामंजस्य बनाए रखने
के बारे में है
जबकि कानून बाहरी जगत् में व्यवस्था बनाए रखने के बारे में है।
प्रत्येक कर्म के दो अंग होते हैं -एक संकल्प और दूसरा क्रियान्वयन। अपराध के संदर्भ में कानून की भाषा में इन्हें क्रमशः लैटिन शब्दों में ‘मेन्स रिया’
और ‘एक्टस रियस’ कहा जाता है।
उदाहरण के लिए एक सर्जन और एक हत्यारा दोनों ही चाकू का उपयोग करते हैं। सर्जन का उद्देश्य व्यक्ति
का जीवन बचाने या इलाज करने का होता है, लेकिन हत्यारे का उद्देश्य
नुकसान पहुँचाना या मारना होता है। मृत्यु दोनों ही स्थितियों में हो सकती है लेकिन उनके उद्देश्य बिल्कुल विपरीत होते हैं।
गीता शाश्वत है जबकि कानून परिस्थिति पर निर्भर होता है। सड़क के बाईं ओर गाड़ी चलाना एक देश
में वैध है और दूसरे देश में यह अपराध हो सकता है। कानून परिस्थितियों को सही या
गलत में विभाजित करता है लेकिन जीवन में कई संदेहास्पद परिस्थितियाँ
होती हैं। गीता हमें इन जटिलताओं के बीच मार्गदर्शन प्रदान करते हुए कहती है कि
हमें न केवल इच्छाओं का त्याग करना चाहिए बल्कि उनके पीछे
छिपे संकल्पों का भी परित्याग करना चाहिए (काम-संकल्प-वर्जिताः 4.19)।
जब तक कोई करों का
भुगतान करता है (एक्टस रियस), कानून को इस बात की परवाह नहीं होती है
कि यह खुशी या तकलीफ के साथ किया गया था (मेन्स रियस)। कानून तब तक कोई कार्यवाही नहीं
करता जब तक देशवासी कानून के परिभाषित मानकों के दायरे में रहते हैं। यदि कोई
व्यक्ति अपराध करने का विचार कर रहा हो तो कानून उस सोच को रोकने में असमर्थ होता
है। दूसरी ओर गीता के अनुसार हमें ऐसे विचारों या संकल्पों को भी छोड़ देना चाहिए।
गीता कहती है कि कर्म
को उसके संकल्प (आरम्भिक) स्तर पर ही पहचानकर
सचेत रहना चाहिए क्योंकि क्रियान्वयन के स्तर पर हमारा कोई
नियंत्रण नहीं रहता। यह उस कहावत की तरह है: ‘पौधा जब छोटा होता है तभी उसका रूप गढ़ा जा सकता है’।
जहाँ कानून का ध्यान
क्रियान्वयन पर केंद्रित होता है, वहीं समकालीन नैतिक साहित्य हमें श्रेष्ठ
संकल्प रखने के लिए प्रेरित करता है। परंतु गीता हमें संकल्पों से भी ऊपर उठने का
उपदेश देती है।
जब कोई संकल्प -अच्छा या बुरा, सफलता या असफलता से मिलता है तो वह भीतर प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। या तो अहंकार प्रबल हो जाता है या फिर आंतरिक तनाव लावे की भाँति भीतर सुलगने लगता है। ये दोनों ही स्थितियाँ
अनुकूल नहीं हैं
क्योंकि ये हमें हमारे अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था से दूर
ले जाती हैं।
समाधान यह है कि हम
अपने संकल्पों का अवलोकन करें ताकि उनसे ऊपर उठकर अपनी
अंतरात्मा की शाश्वत अवस्था तक पहुँच सकें।
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