7. निमित्त-मात्र



श्रीमद्भगवदगीता का जन्म युद्धभूमि में हुआ था। इसी प्रकार कोविड-19 महामारी के दौरान सामने आई चुनौतियाँ भी किसी युद्धभूमि से कम नहीं थीं। गीता का एक वाक्यांश निमित्त-मात्र यानी ‘सर्वशक्तिमान् के हाथों में एक उपकरण’ बड़े स्पष्ट तरीके से इसका सार प्रस्तुत करता है।

अर्जुन श्रीकृष्ण को यथास्वरूप देखना चाहता था और उसे समझने के लिए एक अतिरिक्त शक्ति  की आवश्यकता थी जैसे अंधे को हाथी को देखने के लिए दृष्टि की आवश्यकता होती है। भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे अपने विश्वरूप को देखने के लिए दिव्य दृष्टि दिया। विश्वरूप दिखाने के अतिरिक्त श्रीकृष्ण ने उसे भविष्य का भी दर्शन कराया जहाँ अर्जुन ने देखा कि अनेक योद्धा मृत्यु के मुख में प्रवेश कर रहे हैं।

तब भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि ये योद्धा जल्द ही मारे जाएंगे और तुम इस प्रक्रिया में केवल एक साधन मात्र हो। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अर्जुन कर्ता नहीं है अपितु निमित्त-मात्र है। श्रीकृष्ण यह भी सुनिश्चित करते हैं कि जब अर्जुन विजयी होगा तो वह अहं भाव से मुक्त होगा क्योंकि जीत अहंकार को सर्वाधिक बढ़ावा देती है।

वहीं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान से पलायन नहीं करने दिया। निमित्त-मात्र एक आंतरिक बोध है और इसका प्रतिफल शुद्ध और अहंकार से मुक्त होना तय है। निमित्त-मात्र की अवस्था में ‘मैं कर्ता हूँ’ का भाव यानी अहंकार विलीन होने लगता है। तब यह स्पष्ट होता है कि कर्मों का वास्तविक कर्ता परमात्मा है और हम केवल उसके हाथों में एक उपकरण हैं जिसके माध्यम से कर्म घटित होते हैं।

कोविड-19 के समय हमारी कठिनाइयाँ अर्जुन की परिस्थितियों से मिलती-जुलती थीं। लगभग बिना चिकित्सीय उपचार के, हमने भीतर निमित्त-मात्र की झलक पाई और बाहर सौंपे गए कर्तव्य को यथासम्भव निभाया। ऐसी परिस्थितियाँ अत्यन्त मूल्यवान होती हैं क्योंकि गीता की अनेक शिक्षाएँ तभी भलीभाँति समझ में आती हैं जब उन्हें जीवन की चुनौतियों के बीच अनुभव किया जाता है।

कोयले का टुकड़ा अत्यधिक दबाव और ताप में परिवर्तित होकर हीरा बनता है और सोना अग्नि में तपकर शुद्ध होता है। इसी प्रकार कठिन समय निमित्त-मात्र की अनुभूति को परिपक्व बनाने में सहायक सिद्ध होता हैं। ऐसी परिस्थितियाँ हमें समर्पण के मार्ग द्वारा हमारे अंतरात्मा की शाश्वत स्थिति तक ले जाने की क्षमता रखती हैं।

 

 

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