8. व्यक्त और अव्यक्त
पतवार (rudder) से जुड़े एक छोटे से
यंत्र ‘ट्रिम टैब’ में एक हल्का सा बदलाव एक बड़े जहाज की दिशा को बदल देता है।
इसी तरह गीता का अध्ययन करने के
लिए एक हल्का सा प्रयास हमारे जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। हालाँकि लोग गीता को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं फिर
भी कुछ मूलभूत अवधारणाओं को समझकर इसे आसानी से आत्मसात् किया जा सकता है।
गीता आंतरिक अनुभूति के लिए प्रारंभिक शिक्षा से लेकर
स्नातकोत्तर स्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) तक की एक शाश्वत
पाठ्यपुस्तक
है। सम्भव है कि गीता के पहले अध्ययन में बहुत कम सिद्धांत
समझ में आएँ परंतु यदि हम इसे व्यक्त और अव्यक्त के
दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें तो इसके सिद्धांत सरलता से
आत्मसात् किए जा सकते हैं। अव्यक्त वह है जो हमारी इन्द्रियों से परे है और व्यक्त
वह है जो इन्द्रियों के दायरे में है।
व्यक्त
की कहानी महाविस्फोट (Big Bang) से शुरू होती है। यह तारों के निर्माण
के साथ जारी रहती है। इन तारों के केंद्र में परमाणु मिलकर भारी रासायनिक तत्वों का
निर्माण करते हैं। जब तारे विस्फोट करते हैं तो
ये तत्व पूरे ब्रह्मांड में बिखर जाते हैं। इस ब्रह्मांडीय पदार्थ से फिर ग्रह प्रणाली
बनती है। अंततः
उपयुक्त परिस्थितियों में बुद्धिमान् जीवन विकसित होता है।
वैज्ञानिक
समुदाय इस बात से सहमत है कि सभी व्यक्त रूप -प्राणी,
ग्रह, तारे और यहाँ तक कि स्वयं ब्रह्मांड -एक
निश्चित समय-सीमा के भीतर अस्तित्व में रहते हैं। भले ही उनके सटीक समय माप अलग
हों, उनकी अनित्यता सर्वमान्य है।
इसके विपरीत नश्वर व्यक्त जगत् के पीछे एक अविनाशी अव्यक्त विद्यमान है
जो एक अदृश्य क्वांटम क्षेत्र (quantum
field) के समान है। श्रीकृष्ण ने व्यक्त
जगत् को अपनी अपरा प्रकृति और अव्यक्त को अपनी परा प्रकृति कहा है। जीवन इन दोनों
का मेल है -एक ओर
नश्वर, व्यक्त
भौतिक शरीर और दूसरी
ओर अविनाशी, अव्यक्त आत्मा। इस स्पष्टता के साथ हम आसानी से उनके बीच के संबंध को समझ सकते हैं।
गीता के संदेशों का पालन करके हम अव्यक्त का अनुभव कर सकते हैं।
इस
लक्ष्य की प्राप्ति में अहंकार एक बाधा है। बाहरी सुख-दुःख से अप्रभावित जो आनन्द का अनुभव होता है, वह
अव्यक्त की ओर हमारी प्रगति को दर्शाता है।
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