96. बुद्धि स्वयं में निहित है
एक
बार सृष्टा सोच रहा था कि उस बुद्धि को कहाँ छिपाया जाए जिसे पाकर कुछ भी पाने को
शेष न रहे। उसकी पत्नी एक ऊंचे पहाड़ पर या गहरे समुद्र में रखने का सुझाव देती
है। लेकिन दोनों विकल्पों को छोड़ दिया
गया क्योंकि आदमी पहाड़ पर चढ़ सकता है और पानी में तैर भी सकता है। तब इस बुद्धि
को मनुष्य के अन्दर ही रखने का निर्णय लिया गया जबकि
मनुष्य इसे जीवन भर बाहर खोजता रहता है। यह रूपक हमारे लिए समझना आसान बनाता है जब
श्रीकृष्ण कहते हैं निश्चित रूप से इस
दुनिया में कुछ भी ज्ञान की तरह पवित्र नहीं है। नियत समय में जो योग में सिद्ध हो जाता है, वह इसे स्वयं में पाता है (4.38)। सार यह है कि बुद्धि स्वयं में है और उसी माप से सभी में है। यह सिर्फ अपने
में इसे साकार करने का सवाल है।
श्रीकृष्ण
आगे कहते हैं,
श्रद्धावान् और जितेंद्रिय ज्ञान प्राप्त करके परम शांति को
पाते हैं (4.39)। वे इसके विपरीत बताते हुए कहते हैं, श्रद्धा रहित अज्ञानी नष्ट
हो जाता है और उसके लिए इस लोक में या अन्यत्र कोई खुशी नहीं है (4.40)।
गीता
में श्रद्धा एक मूल उपदेश है। श्रीकृष्ण कई जगहों पर श्रद्धा की बात करते हैं और
अर्जुन को श्रद्धावान् बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। श्रद्धा हमारी पसंद के
कर्मफल प्राप्त करने का अनुष्ठान नहीं है बल्कि जो कुछ भी
हमारे रास्ते में आता है उन्हें कृतज्ञता के साथ स्वीकार करने की आंतरिक शक्ति है।
श्रद्धा यह है कि हमारे पास अस्तित्व की इच्छा से अलग और कोई इच्छा नहीं हो सकती।
‘श्रद्धा’
शब्द दो पदों के मेल से बना है -‘श्रत्’ और ‘धा’। ‘श्रत्’ का अर्थ है सत्य तथा
‘धा’ का अर्थ है धारण करना। अर्थात् सत्य को धारण करने का नाम श्रद्धा है।
इन्द्रियों
को वश में करना गीता का अभिन्न अंग है। श्रीकृष्ण अन्यत्र इन्द्रियों की तुलना
घोड़ों से करते हैं और हमें उन्हें एक प्रशिक्षक की तरह नियंत्रित करने के लिए
कहते हैं
जो घोड़ों को समझकर उनकी सवारी करता है। निश्चित रूप से यह
जागरूकता है परन्तु दमन नहीं।
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