11. सुख-दुःख जीवनसाथी

 



द्वंद्वातीत अर्थात् द्वैत को पार करना गीता में एक और अचूक उपाय है। श्रीकृष्ण अर्जुन को विभिन्न संदर्भों में इस अवस्था को प्राप्त करने की सलाह देते हैं।

        मानवता को प्रायः यह प्रश्न विचलित करता है कि ‘हम सुख पाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं फिर भी दुःख या अप्रियता हमारे जीवन में क्यों आती है?’ अपने भीतर गहराई से झाँकने के बजाय हम स्वयं को यह कहकर समझा लेते हैं कि शायद हमारे प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं किन्तु आशा के साथ जुड़ा हुआ अहंकार हमें पुनः सुख की खोज में लग जाने के लिए प्रेरित करता है और यह प्रक्रिया हमारे जीवन के अंत तक चलती रहती है। द्वंद्वातीत की समझ ही इस समस्या का समाधान है।

        व्यक्त जगत् में प्रत्येक वस्तु अपने विपरीत ध्रुव (द्वंद्व) के साथ ही अस्तित्व में रहती है। जन्म का विपरीत ध्रुव मृत्यु है; सुख का विपरीत ध्रुव दु:ख है; जीत का हार; लाभ का हानि; जोड़ना का घटाना; प्रशंसा का आलोचना; सशर्त प्रेम का घृणा; और यह सूची अंतहीन है।

प्राकृतिक नियम यह है कि जब हम इनमें से किसी एक का पीछा करते हैं तो उसका विपरीत स्वाभाविक रूप से उसके पीछे आता है। जैसे यदि हम किसी डंडे के एक सिरे को उठाते हैं तो दूसरा सिरा भी उठने के लिए बाध्य होता है। एक और रूपक झूलते हुए पेंडुलम का है, जब यह एक ओर जाता है तो स्वाभाविक रूप से दूसरी ओर लौटना पड़ता है।

राग और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्व-मोह के भ्रम के कारण सम्मोहन उत्पन्न होता है। यह अज्ञान हमें द्वन्द्व से परे अव्यक्त को समझने से रोकता है। हम अपने शरीर से और उसके बाद अपने आसपास दिखाई देने वाली अन्य वस्तुओं से जुड़ाव बना लेते हैं।

श्रीकृष्ण हमें इन द्वन्द्वों को पार करने का उपदेश देते हैं। वर्तमान में स्थित होना अतीत और भविष्य से परे जाना है। इसी प्रकार निष्काम प्रेम का अर्थ है राग और द्वेष से परे जाना।

        जब तक हम जीवित हैं द्वन्द्वों के संपर्क में आना स्वाभाविक है। हमें केवल इन द्वन्द्वों के प्रति जागरूक होना चाहिए और जब हम इनके बीच झूल रहे हों, उनका अवलोकन करने का अभ्यास करना चाहिए। यह जागरूकता हमें इन द्वन्द्वों से परे उठने में मदद करेगी। 

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