12. मन पर नियंत्रण



अर्जुन मन की तुलना वायु से करते हुए पूछते हैं कि मन को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है
ताकि यह संतुलन बनाए रखे। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि यह निश्चय ही कठिन है किन्तु नियमित अभ्यास और वैराग्य से इसे प्राप्त किया जा सकता है (6.35)।

इन्द्रियों द्वारा जुटाई गयी जानकारी को सुरक्षित या असुरक्षित में विभाजित करने के लिए मन विकसित हुआ है। ऐसा करने के लिये मन याददाश्त का उपयोग करता है। इस क्षमता ने हमें क्रमिक विकास के दौरान जीवित रहने और समृद्ध होने में मदद की।

मन की उसी क्षमता का उपयोग आंतरिक निर्णय के लिए भी किया जा सकता है जिसे जागरूकता कहा जाता है। हम अपने विचारों और भावनाओं को जागरूकता के साथ दोहराकर अपने मन की फैसला लेने की क्षमता में वृद्धि ला सकते हैं। आज के आधुनिक युग में इसी तरह से फीडबैक का उपयोग कंप्यूटर के काम करने की क्षमता को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। भगवान् श्रीकृष्ण इस आंतरिक शक्ति को अभ्यास के द्वारा विकसित करने का संकेत दे रहे हैं क्योंकि यह स्वाभाविक रूप से नहीं आती। तंत्रिका विज्ञान (न्यूरो साइंस) के दृष्टिकोण से यह नये तंत्रिका प्रतिरूप (न्यूरल पैटर्न) बनाने जैसा है।

वैराग्य को समझना, उसके ध्रुवीय विपरीत ‘राग’ को समझकर आसान हो जाता है। मोटे तौर पर राग दुनिया में सौंदर्य, वृत्ति और भौतिक संपत्ति जैसे सुख की प्राप्ति के लिए एक दौड़ है। द्वंद्व के सिद्धांत के अनुसार हर राग का अंत वैराग्य में होता है। लेकिन हमारा ध्यान हमेशा राग पर होता है और हम वैराग्य को अनदेखा कर देते हैं।

स्टोइसिस्म (stoicism) जैसे कुछ दर्शन मृत्यु के वरण की वकालत करते हैं जो वैराग्य का शिखर है। इसे ‘मेमेंटो मोरी’ कहा जाता है यानी बार-बार मौत को याद करना और अनुभव करना। इसके लिए वे कार्यस्थल या घर में एक प्रमुख स्थान पर मृत्यु की याद के रूप में कुछ स्मृति चिह्न रखते हैं ताकि मृत्यु पर लगातार ध्यान रहे। भारतीय दर्शन में इसे ‘श्मशान वैराग्य’ कहा जाता है जो किसी श्मशान में जाने पर अनुभव होने वाले वैराग्य का प्रतीक है।

        श्रीकृष्ण कहते हैं यदि हम वैराग्य का अभ्यास करें तो यह मन को केंद्र में स्थिर कर देता है। जीवन के प्रतिकूल या कठिन चरण हमें वैराग्य की झलक देते हैं। वैराग्य की एक छोटी-सी झलक भी हमें संतुलित मन प्राप्त करने में सहायता कर सकती है जो अंततः जीवन को आनन्दमय बना देती है।

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