14. साक्षीभाव

 



यदि एक शब्द संपूर्ण गीता का वर्णन कर सकता है तो वह है द्रष्टायानी साक्षी, जिसका प्रयोग अनेक संदर्भों में किया गया है। इसे समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि हम सोचते हैं कि हमही सब कुछ करते हैं और परिस्थितियों को नियंत्रित भी करते हैं। आनन्दमय जीवन जीने के लिए हमें इस धारणा से मुक्त होने की आवश्यकता है।

        कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय अर्जुन लगभग साठ वर्ष के थे। उन्होंने अच्छा जीवन बिताया था और सभी तरह की विलासिता का भोग किया था। एक योद्धा के रूप में उन्होंने कई युद्धों में विजय प्राप्त की थी। परंतु कुरुक्षेत्र युद्ध के क्षण में उन्हें लगा कि वे ही कर्ता हैं और अपने ही सगे-संबंधियों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार होंगे। इसी कारण वह युद्धभूमि में विषादग्रस्त हो गए।

सम्पूर्ण गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बोध कराने का प्रयास करते हैं कि वह कर्ता नहीं है बल्कि द्रष्टा यानी साक्षी है। जब हम स्वयं को केवल निमित्त-मात्र अर्थात् परमात्मा के हाथों में एक उपकरण मानने लगते हैं तब हम ‘साक्षीभाव’ की दिशा में आगे बढ़ते हैं। इस अवस्था में यह स्पष्ट होता है कि कर्मों का वास्तविक कर्ता परमात्मा है और हम केवल उसके हाथों में एक उपकरण हैं जिसके माध्यम से कर्म घटित होते हैं।

हममें से अधिकांश यह मानते हैं कि हम अपने सभी कर्मों के कर्ता हैं और अपने भाग्य के स्वामी हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म तो गुणों के समन्वय से उत्पन्न होते हैं, किसी कर्ता के कारण नहीं (3.27)। जब हम अस्तित्वगत स्तर पर इस सत्य को समझ लेते हैं तब हम साक्षी अवस्था में प्रवेश कर जाते हैं।

द्रष्टा बुद्धि की एक आंतरिक अवस्था है। भौतिक दुनिया में इसे महसूस करना मुश्किल होता है। यह वह क्षमता है जो हमें अपने आसपास दिन-प्रतिदिन होनेवाली घटनाओं से प्रभावित हुए बिना आतंरिक रूप से स्थिर रहने में मदद करती है। हालाँकि भौतिक दुनिया में हमें सुख और दु:ख के द्वंद्व से गुजरना पड़ता है परन्तु बुद्धि की यह आंतरिक अवस्था हमें किसी कर्मफल की इच्छा के बिना कर्म करने में मदद करेगी (2.47)। यह हमारी भावनाओं को साक्षीभाव से देखने और उन्हें अधीन रखने की क्षमता है।

        श्रीकृष्ण साक्षीभाव के विभिन्न पहलुओं को समझाते हुए कहते हैं कि जो सभी जीवों में परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है और जो इस नश्वर शरीर में आत्मा और परमात्मा को अविनाशी रूप में देखता है वही वास्तव में देखता है (13.28); जो यह देखता है कि सभी कर्म केवल प्रकृति द्वारा ही किए जाते हैं और आत्मा को अकर्ता समझता है वही वास्तव में देखता है (13.30)


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