15. समत्व

 




समत्व गीता की नींव जैसा है और इसलिए इसका वर्णन गीता में विभिन्न स्थानों पर किया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण विभिन्न स्थानों पर समत्व-भाव, समत्व-दृष्टि और समत्व-बुद्धि की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। समत्व को समझना आसान है परंतु उसे आत्मसात् करना अत्यन्त कठिन है। हमारे भीतर समत्व का स्तर ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा की प्रगति का सूचक है।

        गीता की शिक्षा वस्तुओं के साथ हमारे संबंध से आरम्भ होती है, फिर धीरे-धीरे उसे लोगों तक विस्तारित करती है और अंततः हमें प्रशंसा तथा निन्दा जैसी परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखना सिखाती है। श्रीकृष्ण हमें सोने और पत्थर को समान दृष्टि से देखने तथा गाय, हाथी और कुत्ते में समदृष्टि रखने का उपदेश देते हैं अर्थात् किसी को अधिक और किसी को कम मूल्यवान न मानने की दृष्टि विकसित करने के लिए।

        लोगों के संदर्भ में कठिनाई यह है कि हम संस्कृति, धर्म, जाति, राष्ट्रीयता, नस्ल और लिंग जैसे कृत्रिम विभाजनों में से किसी एक या अधिक के साथ अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। इन विभाजनों से ऊपर उठकर दो भिन्न व्यक्तियों के प्रति समान दृष्टि रखना समत्व की दिशा में पहला कदम है। श्रीकृष्ण हमें उपदेश देते हैं कि हम अपरिचितों, सम्बन्धियों, मित्रों, शत्रुओं, द्वेष करने वालों तथा सज्जनों -सभी के प्रति समान भाव रखें (6.9)   समत्व में प्रगति का अगला स्तर दो लोगों को समत्व के साथ देखने की क्षमता है जिनमें एक हमारा अपना हो और दूसरा न हो। उदाहरण के लिए अपने मित्रों के बच्चों की सफलता पर खुश होना, खासकर जब हमारे बच्चों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया; माँ और सास के साथ समान व्यवहार करना; बेटी और बहू के साथ समान व्यवहार करना आदि।

        समत्व का उच्चतम स्तर दूसरों को अपने समान समझने की क्षमता है। जब दूसरों को वह मिलता है जिसे हम अपना अधिकार समझते हैं जैसे पदोन्नति, प्रसिद्धि, श्रेय, संपत्ति आदि -ऐसी स्थिति में भी समता बनाए रखना ही समत्व है। श्रीकृष्ण कहते हैं सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32); जो समत्व का सर्वोच्च स्तर है। समत्व के इस उच्चतम स्तर को प्राप्त करने में हमारा मन बाधा डालता है क्योंकि यह विभाजन करने का अभ्यस्त होता है। मन को हावी होने देने के बजाय हमें इस पर नियंत्रण रखने में सक्षम होना चाहिए।

        यह तब संभव होता है जब हम दूसरों की कमजोरियों को अपने भीतर और अपनी क्षमताओं को उनमें पहचानने लगते हैं। श्रीकृष्ण हमें उपदेश देते हैं कि हम स्वयं को दूसरों में और दूसरों को अपने में देखें; और हर जगह उन्हें देखें।

 


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