145. पुनर्जन्म पर पुनर्विचार
श्रीकृष्ण
ने कहा कि मुझे प्राप्त होकर मेरे महान् भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता (8.16) जो अन्यथा दु:खों का घर है (8.15)। इस सन्दर्भ में
पुनर्जन्म को समझना महत्वपूर्ण है।
पुनर्जन्म
की व्याख्या आमतौर पर मृत्यु के बाद एक नया जीवन प्राप्त करने के रूप में की जाती
है जो इसका शाब्दिक अनुवाद है। इसकी व्याख्या हमारे चारों
ओर एक नई स्थिति के जन्म के रूप में भी की जा सकती है।
हमारे
चारों ओर नियमित रूप से परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं जिन्हें इंद्रियाँ अपने
संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों (cognitive biases) के
साथ ग्रहण करती हैं । जब कोई स्थिति समाप्त होती है तो
उसके द्वारा हमारे भीतर उत्पन्न होने वाली तरंगें हमारी प्रतिक्रियाओं या व्यवहार
के कारण कई और स्थितियों को जन्म देती हैं। उदाहरण के लिए कार्यस्थल
पर बीता एक खराब दिन परिवार के साथ बिताई जाने वाली शाम को भी प्रभावित कर सकता
है। श्रीकृष्ण ने इस चक्रीय प्रक्रिया को दु:खों का घर कहा। लेकिन जिन लोगों ने
परमात्मा को प्राप्त कर लिया है उनके लिए ये इन्द्रियों
द्वारा लाई गई संवेदनाएँ समुद्र में नदियों की तरह खो जाते हैं। इसलिए नई
स्थितियों के पैदा होने की कोई सम्भावना नहीं होती।
बाहरी
स्थितियों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है लेकिन हम खुद को बदल सकते हैं ताकि वह
परिस्थितियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं और हम साक्षी मात्र बनकर रह जाते हैं। इस
परिवर्तन के मार्ग को परमपथ के रूप में वर्णित किया जाता है। वीत-राग अर्थात् न
राग न विराग इस मार्ग का प्रवेश द्वार है (8.11) जो स्थितियों और
लोगों के लिए लालसा और द्वेष दोनों का त्याग करना है (7.27)। अगला कदम इन्द्रियों को नियंत्रित करना है, मन
को हृदय में सीमित करना और भगवान् को याद करना है (8.12-8.13)।
श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि जब इस मार्ग का अनुसरण करते हैं तो वे उन्हें आसानी
से प्राप्त हो जाते हैं (8.14)।
हम
स्थितियों और लोगों को बदलने की कोशिश करते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि वे हमारे
दु:खों के लिए जिम्मेदार हैं और उन्हें दोष देते हैं। वास्तविक परिवर्तन हमारे
भीतर होना चाहिए जहाँ परिस्थितियाँ या लोग हमें प्रभावित करने की क्षमता खो देते
हैं जो वास्तव में पुनर्जन्म न होने की स्थिति है।

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