42. संतुलित निर्णय
तथ्यों
के आधार पर हम अपने लिए,
अपने परिवार और समाज के लिए कई निर्णय लेते हैं। श्रीकृष्ण
हमें इस निर्णय लेने की क्षमता को अगले स्तर तक ले जाने के लिए प्रोत्साहित करते
हुए कहते हैं ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (2.50)। सामान्यतः इस
श्लोक की व्याख्या इस रूप में की जाती है कि योग का अर्थ किसी कार्य या पेशे में
निपुणता प्राप्त करना है। परन्तु इसका गूढ़ संदेश यह है कि समत्व की अवस्था में
किया गया प्रत्येक कर्म सामंजस्य और संतुलन से परिपूर्ण होता है। यह एक फूल की
सुंदरता और सुगंध की तरह फैलने वाले सामंजस्य का अनुभव करने के लिए कर्तापन और
अहंकार को छोड़ने के बारे में है।
कर्ता
के रूप में
हमारे सभी निर्णय अपने और अपने परिवार के लिए सुख प्राप्त
करने और दु:ख से बचने के लिए निर्देशित होते हैं। यात्रा का अगला स्तर संतुलित
निर्णय लेना है,
खासकर जब हम संगठनों और समाज के लिए जिम्मेदार हैं। इस स्तर
पर कर्तापन की भावना बनी रहती है।
यहाँ श्रीकृष्ण उस परम स्तर की बात कर रहे हैं जहाँ कर्तापन को ही त्याग दिया जाता
है और ऐसा व्यक्ति जो कुछ भी करता है वह संतुलित होता है। सर्वव्यापी चैतन्य उनके
लिए कर्ता बन जाते हैं।
यह
चरण सभी निर्णयकर्ताओं के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसलिए भारतीय प्रशासनिक सेवा
(आई.ए.एस) ने ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ को अपने आदर्श वाक्य के रूप में अपनाया।
यह
भावनाओं
और पूर्वाग्रहों से पहचान नहीं करने के बारे में है। ऐसी
पहचान तथ्यों को सही सन्द्रर्भ में समझने की हमारी क्षमता को क्षीण करती है जिसकी
वजह से गलत निर्णय लेने की सम्भावना बढ़ जाती है। यह इस बारे में है कि इन्द्रियों
और इन्द्रिय विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख-दु:ख की ध्रुवों से प्रभावित होने पर
हम कितनी शीघ्रता से मध्य में लौट आते हैं।
कानून
का क्रियान्वयन हमेशा सुखद नहीं होता है। तटस्थ रहकर हम प्रशंसा और आलोचना को समान
रूप से स्वीकार कर सकते हैं।
जो
दृढ़ता से मध्य में स्थित हैं उनके लिए बुद्धि, ऊर्जा और करुणा के मामले
में असीमित क्षमता मौजूद है। ऐसे संसाधनों को प्राप्त करने के बाद भौतिक जगत् के दृष्टिकोण से कामयाबी हासिल करना निश्चित है। पृथ्वी पर जीवन
संभव है क्योंकि यह बीच में स्थित है न तो सूर्य के बहुत करीब और न ही बहुत दूर जिससे जीवन देने वाला पानी तरल रूप में मौजूद है।

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