47. स्थितप्रज्ञ आंतरिक अवस्था है
अर्जुन
के संदेह के उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं स्थितप्रज्ञ स्वयं
से संतुष्ट होता है (2.55)। दिलचस्प बात यह है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न के दूसरे भाग का उत्तर नहीं
दिया कि स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता
है?
‘स्वयं के साथ संतुष्ट’
आंतरिक अवस्था है और बाहरी व्यवहार के आधार पर इसे पहचानने का कोई तरीका नहीं है।
हो सकता है
दी गई परिस्थितियों में एक अज्ञानी और एक स्थितप्रज्ञ दोनों
एक ही शब्द बोल सकते हैं,
एक ही तरीके से बैठ और चल सकते हैं। इस वजह से स्थितप्रज्ञ
की हमारी समझ और भी जटिल हो जाती है।
श्रीकृष्ण
का जीवन स्थितप्रज्ञ जीवन का सर्वोत्तम उदाहरण है। जन्म के समय वह अपने माता-पिता
से अलग हो गए थे। उन्हें माखन चोर के नाम से जाना जाता है। उनकी रासलीला, नृत्य और बांसुरी पौराणिक है, लेकिन जब उन्होंने वृंदावन छोड़ा तो वे
रासलीला की तलाश में कभी वापस नहीं आए। वह जरूरत पड़ने पर लड़े लेकिन कई बार युद्ध से बचते रहे और इसलिए उन्हें रण-छोड़-दास के नाम से जाना
जाता था। उन्होंने कई चमत्कार दिखाए और वह दोस्तों के दोस्त रहे। जब विवाह करने का
समय आया तो उन्होंने विवाह किया और परिवारों का भरण-पोषण किया। चोरी के झूठे
आरोपों को दूर करने के लिए समंतक मणि का पता लगाया और जब सही समय आया तो उन्होंने गीता
का ज्ञान दिया। अंत में उनका देहांत किसी साधारण व्यक्ति की तरह हुआ।
उनके
जीवन के बाहरी स्वरूप का अनुमान लगाना बहुत कठिन है लेकिन
आंतरिक स्वरूप यह है कि वे हर क्षण को जीते हैं। यह कठिन परिस्थितियों के बावजूद आनन्द
और उत्सव का जीवन है। उनके लिए स्वयं के साथ संतुष्ट का अर्थ निष्क्रियता या अकर्म
नहीं है
बल्कि यह कर्तापन की भावना और कर्मफल की इच्छा को त्याग कर कर्म
करना है।
यह
अतीत के किसी बोझ या भविष्य से किसी अपेक्षा के बिना वर्तमान क्षण में जीना है।
शक्ति वर्तमान क्षण में है और योजना और क्रियान्वयन सहित सब कुछ वर्तमान में होता
है।
यह ऐसे आनंद से भरा जीवन है जो स्वाभाविक, निरपेक्ष और बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र होता है। इसके विपरीत, इन्द्रियों और उनके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख क्षणिक होता है और अंततः दुःख में परिणत होता है।

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