49. घृणा भी एक बंधन है
हम
किसी परिस्थिति,
कार्य के परिणाम या व्यक्ति को अच्छे या बुरे के रूप में वर्गीकरण करने के आदी हैं। एक तीसरा
विकल्प भी है, कोई वर्गीकरण न करना अर्थात् तटस्थ रहना। श्रीकृष्ण इस तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हुए कहते हैं
कि बुद्धिमान् व्यक्ति वह है जो शुभ की प्राप्ति पर खुशी से नहीं भरता है और न ही
वह अशुभ से घृणा करता है। वह हमेशा बिना आसक्ति के रहता है (2.57)। यह श्रीकृष्ण के उस उपदेश का ही विस्तार है कि बुद्धिमान् व्यक्ति शुभ और अशुभ
दोनों कर्मों का त्याग कर देता है (2.50)। इसका तात्पर्य यह है कि स्थितप्रज्ञ
विभाजन को छोड़ देता है और तथ्यों को तथ्यों के रूप में लेता है क्योंकि विभाजन सुख और दु:ख की द्वन्द्वों का जन्मस्थान है।
इस
श्लोक का आचरण कठिन है क्योंकि यह तथ्यों को तुरंत अच्छे या बुरे के रूप में
विभाजन करने की हमारी प्रवृत्ति के विपरीत है। जब कोई बुरे के रूप में चिह्नित किए
गए किसी स्थिति या व्यक्ति का सामना करता है तो
घृणा और विमुखता स्वचालित रूप से उत्पन्न होती है। दूसरी ओर स्थितप्रज्ञ
इसे वर्गीकृत नहीं करता और इसलिए नफरत का सवाल ही नहीं उठता है। इसी प्रकार शुभ
होने पर स्थितप्रज्ञ उत्तेजित भी नहीं होता है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं
‘क्षमा’ उन्हीं से उत्पन्न गुण है (10.4) और यह दैवी प्रकृति
वाले व्यक्ति की अमूल्य संपदा है (16.3)। क्षमा घृणा का सबसे प्रभावी उपचार है।
इसके लिए साहस,
सजगता और करुणा की आवश्यकता होती है। साथ ही, यह समझ भी आवश्यक है कि इस जगत् में कोई भी कर्ता नहीं है; इसलिए हमें अपने दुःख और आघात के लिए किसी को दोष देने की आवश्यकता नहीं है।
क्षमा घृणा को खत्म करके मन में शांति लाती है।
स्थितप्रज्ञ परिस्थितियों को उसी प्रकार संभालता है जैसे कोई
कुशल शल्य-चिकित्सक (surgeon)
जो जाँच-पड़ताल से प्राप्त तथ्यों के आधार पर शल्य-क्रिया (surgery) करता है। वह एक ऐसे अतिचालक (super-conductor) के समान होता है जो समस्त बिजली को बिना किसी अवरोध के प्रवाहित होने देता है।
हम
सामान्यतः परिस्थितियों, व्यक्तियों या कर्मों के प्रति या तो आसक्त
हो जाते हैं या उनसे विरक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति को समझना तो आसान है परंतु विरक्ति भी एक प्रकार की घृणा के साथ आसक्ति ही है। जब श्रीकृष्ण कहते
हैं स्थितप्रज्ञ अनासक्त होता है तो उनका अर्थ यह है कि वे आसक्ति
और विरक्ति (घृणा) दोनों को छोड़ देते हैं।

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