56. जीवन की चार अवस्थाएँ
श्रीकृष्ण
कहते हैं “जैसे जल में चलनेवाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे
ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है” (2.67)। हवा हमारी इच्छाओं का एक रूपक है जो हमारे मन और इन्द्रियों को प्रभावित
करती है और बुद्धि (नाव) को अस्थिर कर देती है।
इच्छाओं
के सन्दर्भ में
जीवन को चार चरणों में विभाजित किया जाता है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,
वानप्रस्थ और संन्यास। यह विभाजन न केवल उम्र पर बल्कि जीवन
शैली पर भी आधारित होता है।
पहले
चरण में कुछ बुनियादी कौशल के साथ बड़ा होना, सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्त
करना और शारीरिक शक्ति एकत्र करना शामिल है। दूसरे चरण में यह
परिवार, कर्म,
कौशल में वृद्धि, संपत्ति और यादें इकट्ठा
करना, जीवन के विभिन्न पहलुओं के संपर्क में आना और सफलता या असफलता के साथ जुनून और
इच्छाओं का पीछा करते हुए जीवन के अनुभव प्राप्त करना है। इस प्रक्रिया के माध्यम
से
व्यक्ति ज्ञान, कौशल और जीवन के अनुभवों
का मिश्रण प्राप्त करता है जो जागरूकता के लिए प्रशिक्षण स्थल है।
तीसरे
चरण में रूपांतरण स्वचालित नहीं है। जैसे महाभारत में उल्लेख है कि राजा ययाति को इस स्थिति के लिए एक हजार साल लग गए क्योंकि वे अपनी
विलासिता को नहीं छोड़ सके। दिलचस्प बात यह है कि ये अतिरिक्त वर्ष उनके पुत्र के आयु के त्याग से आये। इन
परिस्थितियों में
यह श्लोक (2.67) हमें चिंतन करने और
तीसरे चरण में रूपांतरण करने में मदद करता है।
तीसरे
चरण में
जागरूकता हमें धीरे-धीरे इच्छाओं को छोड़ने में मदद करती है
क्योंकि हमें यह एहसास हो जाता है कि अतीत की इच्छाएँ अब मूर्खतापूर्ण या अप्रासंगिक हैं; कैसे पूरी हुई और अधूरी इच्छाएँ भी विनाशकारी परिणाम दे सकते हैं और हमारी
पिछली धारणाएँ कितनी गलत थी। इस बोध के साथ हम अहंकार एवं
कर्तापन का त्यागकर अंतिम चरण में एक संन्यासी बनने के लिए तैयार हो जाते है।
अंतिम
चरण में
यह पहले चरण के इन्द्रियों के माध्यम से ‘जानने’ से लेकर इन्द्रियों
से स्वतंत्र ‘होने’ तक की यात्रा है। श्रीकृष्ण इसे कहते हैं “बुद्धि की स्थापना तब होती है जब सभी इन्द्रियों को विषयों से रोक दिया जाता
है” (2.68)।

Comments
Post a Comment