87. कर्म में अकर्म
श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म और अकर्म का विषय अत्यन्त जटिल है; यहाँ तक कि बुद्धिमान् भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। आगे वे स्पष्ट करते हैं कि सच्चा ज्ञानी वह है जिसके सभी कर्म कामना और संकल्प से रहित हों (काम-संकल्प-वर्जितः) और जिसके कर्म ज्ञानाग्नि में भस्म हो चुके हों (4.19)।
कर्म
और अकर्म को समझाने के लिए श्रीकृष्ण कर्म में अकर्म की झलक दिखाते हुए कहते हैं “जो पुरुष अपने कर्मों के फलों में आसक्ति को त्यागकर बिना किसी पर आश्रित हुए नित्य-तृप्त रहता है, वह भलीभाँति कर्म करता हुआ भी वास्तव में
कुछ नहीं करता” (4.20)। इसका सार यह है कि ऐसा नित्य-तृप्त पुरुष कर्म करते हुए भी
कर्ता नहीं रहता।
पहला, जब कर्मफल की आसक्ति छूट जाती है तब कर्तापन का भाव स्वतः समाप्त
हो जाता है। दूसरे,
‘नित्य-तृप्त’ व्यक्ति किसी कर्म
के पीछे स्वार्थ नहीं रखता। वह विराट अस्तित्व द्वारा प्रदान किए गए कर्मों
को सहज रूप से करता है और यही निष्काम कर्म है। तीसरा, वह इन्द्रिय-सुखों,
जैसे दूसरों से प्रशंसा या मान-सम्मान, पर निर्भर नहीं रहता। अन्ततः ऐसा व्यक्ति कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
गीता
हमें प्रेरित करती है कि हम अपने सामने आने वाली समस्याओं और दुविधाओं की जड़ों पर
ध्यान केन्द्रित करें। हम सभी इस उलझन में रहते हैं कि ‘क्या करें और क्या न करें’।
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि इस विषय में बुद्धिमान् भी भ्रमित हो जाते हैं। इस
अस्तित्वगत श्लोक में वे हमें ‘नित्य-तृप्त’ होने, ‘किसी पर आश्रित न रहने’ और कर्मफल का त्याग करने का मार्ग बताते हैं। जब यह अवस्था
प्राप्त होती है,
तब हम कर्म करते हुए भी कुछ भी नहीं करते। यही कर्म और अकर्म
के संबंध में उत्पन्न भ्रम का समाधान है।
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