123. आराम क्षेत्र से परे


 


कुछ सदियों पहले यूरोप में अमेरिका के अस्तित्व के बारे में कोई नहीं जानता था। जब कोलम्बस वहां पहुँचा तो यह उसकी समझ के बाहर था कि एक विशाल महाद्वीप खोजे जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। क्योंकि उसका ज्ञान उस समय के भूगोल तक ही सीमित था, उसने इसे गलती से एशिया समझ लिया और बाकी इतिहास है।

ऐसी घटना को समझाते हुए आधुनिक मनोविज्ञान सोचने की दो प्रणालियों का उल्लेख करता है। इन्हें मन और बुद्धि माना जा सकता है। श्रीकृष्ण ने पहले कहा है कि बुद्धि मन से श्रेष्ठ है और मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है (3.43)। मन स्वचालित, सहज और हमारे शारीरिक अस्तित्व की रक्षा के लिए उत्तरदायी होता है। बुद्धि जटिल विषयों को समझने और उनका समाधान करने में पर्याप्त प्रयास तथा ध्यान लगाती है। किंतु हम त्वरित निष्कर्ष या तत्काल परिणाम प्राप्त करने के लिए बुद्धि के कार्यों में भी मन का उपयोग करने लगते हैं। ऐसे निष्कर्ष कोलंबस के निष्कर्षों की तरह गलत होने की संभावना रखते हैं क्योंकि उनके पीछे ठोस प्रमाणों का अभाव होता है जबकि प्रमाणों का संग्रह और उनका परीक्षण करना बुद्धि का कार्य है।

अर्जुन भी दूसरी प्रणाली के मुद्दे के लिए पहली प्रणाली का उपयोग कर रहा था और श्रीकृष्ण से पूछता है मेरे चंचल मन के कारण, मैं आपके द्वारा सिखाए गए समत्व योग की शाश्वत स्थिति को समझने में असमर्थ हूँ (6.33)। मन वास्तव में बेचैन, अशांत, बलवान और हठी होता है। मैं मानता हूँ कि इसे नियंत्रित करना उतना ही मुश्किल है जितना हवा को नियंत्रित करना (6.34)

अर्जुन की मन:स्थिति इस ज्ञान तक सीमित है कि मन चंचल है और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इसे नियंत्रित करना कठिन है। अर्जुन के ये निष्कर्ष उसके पिछले अनुभवों पर आधारित हैं जो हमारी इन्द्रियों की दृष्टि से परे देखने की हमारी क्षमता को सीमित करते हैं।

संयोग से उनका सवाल सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि पूरी मानवता का सवाल है। मोटे तौर पर हम सभी का मत है कि रास्ता कठिन है। एक ओर श्रीकृष्ण का अनंत आनन्द का आश्वासन हमें लुभाता है (6.28) लेकिन अज्ञात का भय हमें हमारे आराम क्षेत्र में वापस खींच लेता है।

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