208. जीवन का उल्टा वृक्ष
भगवद्गीता
के पंद्रहवें अध्याय को ‘पुरुषोत्तम योग’
कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का
प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं “ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर
और शाखाएँ नीचे की ओर होती
हैं,
और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता
है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुई हैं; इसकी कोमल कोपलें इन्द्रिय विषय हैं; इसकी जड़ें नीचे की ओर
फैली हुई हैं, जो मनुष्यों को कर्म से बाँधती हैं” (15.2)।
सबसे
पहले, जो लोग इस वृक्ष को जानते हैं, उन्हें वेदों का ज्ञान
प्राप्त होता है। वेदों का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। एक संभावित व्याख्या यह है कि
वेदों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उन्हें पढ़ने का कष्ट उठाने
की आवश्यकता नहीं है। एक बार जब इस जीवन-वृक्ष को अस्तित्वगत स्तर पर समझ लिया जाता
है
तो वही ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
दूसरे, अश्वत्थ का अर्थ है ‘वह जो कल भी एक सा नहीं रहता।’ लेकिन वृक्ष को शाश्वत
बताया गया है। यह कुछ विरोधाभासी प्रतीत होता है जैसे
प्रकाश का तरंग-कण द्वैत (wave–particle duality)
का विरोधाभास। मूलतः, वृक्ष शाश्वत और परिवर्तन
दोनों का मिश्रण है। आगे के श्लोकों में और स्पष्टता आएगी।
यह
रूपक हमें अपने आस-पास की दुनिया के बारे में अपनी सोच को बदलने में मदद करेगा। हमारी
समझ में प्रगति का अर्थ है शक्ति और प्रसिद्धि के मामले
में कुछ उच्चतर प्राप्त करना; अधिक संपत्ति प्राप्त करना। हम आध्यात्मिक प्रगति के बारे में भी ऐसा ही सोचते
हैं। यह रूपक इंगित करता है कि उच्च आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ
है जड़ों की ओर लौटना। यह त्यागने के बारे में है न कि
प्राप्त करने के बारे में;
यह हमारे जीवन के दौरान बने तंत्रिका प्रतिरूपों
को तोड़ने जैसा है; यह एक नमक की गुड़िया की
तरह है जो समुद्र के साथ एक होने के लिए खुद को विलीन कर रही है। हमें उस धूल को हटाना
है जो हमने लंबे समय से जमा की है।

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