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135. योग-माया

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  श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी अपरा प्रकृति व्यक्त है और परा प्रकृति जीवन-तत्व है , जो अव्यक्त है। उनका कहना है कि योग-माया (तीन गुणों से पैदा हुआ भ्रम) उन्हें अलग करता है और हमें उन्हें (परमात्मा को) अजन्मा , अविनाशी ( 7.25), भूत , वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता के रूप में जानने से रोकता है ( 7.26) । योग-माया दर्पणों के कमरे की तरह है जो हमें प्रतिबिंबित करता है और यह जानना असंभव है कि इसके परे क्या है। यह असमर्थता हमें यह निष्कर्ष निकालने के लिए विवश कर देती है कि हर इकाई व्यक्त है यह समझे बिना कि उनके पीछे एक अव्यक्त जीवन-तत्व भी मौजूद है , और श्रीकृष्ण उनको मूर्ख कहते हैं ( 7.24) । यह कुछ नहीं , बल्कि परमात्मा के प्रति अनादर के साथ मनुष्य-मनुष्य के बीच परस्पर बर्ताव है जो असुरों का मार्ग है। बिजली (ऊर्जा) एक उच्च वोल्टेज बिंदु से कम वोल्टेज बिंदु तक प्रवाहित होती है जो रास्ते में विद्युत उपकरणों को सक्रिय करती है। लाक्षणिक रूप से , यदि हम परमात्मा को अनंत वोल्टेज के बिंदु के रूप में लेते हैं , तो ऊर्जा प्रवाह और कुछ नहीं बल्कि श्रद्धा की केबल के माध्यम से हमें प्राप्त होने वाला आश...

134. खुद से प्रतिस्पर्धा

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  श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया है कि चार प्रकार के भक्त उनकी पूजा करते हैं ; जिनमें कुछ अपनी कठिनाइयों को दूर करने के लिए (आर्त) , कुछ सफलता प्राप्त करने के लिए (अर्थार्थी) , कुछ ज्ञान प्राप्त करने के लिए (जिज्ञासु) और ज्ञानी ( 7.16) । वह ज्ञानी के बारे में विस्तार से बताते हैं और कहते हैं कि ‘‘उनमें नित्ययुक्त मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाले ज्ञानी भक्त अति उत्तम हैं , क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है’’ ( 7.17) । वे कहते हैं कि अनेक जन्मों में तत्वज्ञान को प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष अंत में मुझ तक पहुंचता है ( 7.19) । आमतौर पर कई ‘जन्म’ की व्याख्या की जाती है कि हमें ज्ञानी बनने के लिए कई जन्मों से गुजरना होगा , हालांकि इसका कोई कारण नहीं दिखता है। साधारण समझ के अनुसार ‘जन्म’ की व्याख्या हमारे भौतिक शरीर की उत्पत्ति   के रूप में की जाती है परन्तु ‘जन्म’ का अर्थ एक अन्य रूप में लेने से स्पष्टता आएगी। यह हमारे आस-पास की किसी स्थिति या परिस्थिति का ‘जन्म’ हो सकता है जो एक सतत प्रक्रिया है। ये अनुकूल या ...

133. श्रद्धा ही ताकत है

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  अस्तित्व व्यक्त और अव्यक्त का सामंजस्य है जिसमें मनुष्य व्यक्त और परमात्मा अव्यक्त है। बुनियादी स्तर का आपसी बर्ताव परमात्मा के अनादर के साथ मनुष्य और मनुष्य के बीच होता है। श्रीकृष्ण ने इसे असुरों का मार्ग बताया है ( 7.15) । अगले स्तर का बर्ताव मनुष्य और परमात्मा के बीच होता है। यह संक्रमण तब शुरू होता है जब कोई मृगतृष्णा का पीछा करते हुए थक जाता है या अपनी दुर्गति से परेशान हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य और परमात्मा के बीच ये बर्ताव यानी पूजा चार प्रकार की होती है। पहली श्रेणी के उपासक अपनी कठिनाइयों को दूर करना चाहते हैं , दूसरी श्रेणी के उपासक धन , सफलता या मन की शांति प्राप्त करना चाहते हैं , तीसरी तरह के उपासक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं और चौथे ज्ञानी होते हैं ( 7.16) । श्रीकृष्ण कहते हैं कि पहले तीन उपासक , जो ज्ञान से वंचित हैं , अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए विभिन्न देवताओं की आराधना करते हैं ( 7.20) । यह बीमारियों के आधार पर संबंधित चिकित्सक के पास जाने जैसा है। वह आगे कहते हैं कि जब वे श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं , वह (श्रीकृष्ण) उस श्रद्धा को अविचल...

132. दुर्गति दुर्गति को ही लाएगी

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  श्रीकृष्ण ने अपनी परा प्रकृति का वर्णन किया जो तीन गुणों से परे जीवन-तत्व है। उनकी अपरा प्रकृति आठ प्रकार की होती है - अग्नि , पृथ्वी , जल , वायु , आकाश , मन , बुद्धि और अहंकार जो गुणों के सम्मोहन के अधीन है। जबकि परा प्रकृति को अव्यक्त के रूप में संदर्भित किया जाता है जो शाश्वत , अविनाशी और अथाह है , अपरा प्रकृति व्यक्त होती है जो कई मायनों में सीमित है। आसानी से समझने के लिए मनुष्य को व्यक्त और परमात्मा को अव्यक्त माना जा सकता है जो इंद्रियों से परे है। आपसी बर्ताव का पहला स्तर मनुष्य और मनुष्य के बीच है जो व्यक्त के साथ हमारी पहचान का परिणाम है। अगला स्तर मनुष्य और परमात्मा के बीच है। मनुष्य से मनुष्य के स्तर पर , चीजें और संसाधन एक पोखर में पानी की तरह सीमित हैं जबकि यह परमात्मा के स्तर पर समुद्र की तरह असीमित है। जो मन विभाजन करने के लिए प्रशिक्षित होता है , वह भौतिक संपत्ति , शक्ति और पदों के सन्दर्भ में हमारे पास और दूसरों के पास जो कुछ है , उसकी लगातार तुलना करता रहता है , जो हथियाने की ओर ले जाता है क्योंकि हर कोई इन सीमित चीजों के लिए लड़ता है। उदाहरण के लिए , मुख्य...

131. भ्रमों को पार करना

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  श्रीकृष्ण ने प्रकृति जनित तीन गुणों के बारे में उल्लेख किया है और हम सभी उनके द्वारा अलग-अलग कर्मों को अलग-अलग तरीकों से करने के लिए बाध्य हैं ( 3.5) । वास्तव में , सभी कर्म गुणों द्वारा किए जाते हैं ( 3.27) और ये कर्म और कुछ नहीं बल्कि गुणों के बीच का परस्पर प्रक्रिया हैं। सत्व गुण ज्ञान के प्रति आसक्ति है ; रजो गुण कर्म के प्रति आसक्ति है और तमस अज्ञान और आलस्य की ओर ले जाता है। इस संबंध में , श्रीकृष्ण आगे कहते हैं , ‘‘ सत्व , तमो और रजो गुणों की सभी अभिव्यक्तियां मुझसे निकलती हैं। हालांकि वे मुझमे हैं , मैं उनमें नहीं हूं’’ ( 7.12) । इस विरोधाभासी श्लोक को बादलों और आकाश के रूपक के साथ समझा जा सकता है , जहां बादल आकाश में हैं लेकिन आकाश बादलों में नहीं है और बादल आकाश के बिना मौजूद नहीं हो सकते हैं। यह समुद्र में लहरों की तरह है जहां लहर सागर में हैं लेकिन सागर लहरों के बिना भी हो सकता है। वह आगे विस्तार से बताते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों से भ्रमित होकर , प्राणी मुझे शाश्वत और सभी गुणों से परे जानने में असमर्थ हैं ( 7.13) । श्रीकृष्ण ने पहले भी आगाह किया था कि इन गुणों ...

130. अज्ञेय को जानना

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  श्रीकृष्ण ने अपनी परम प्रकृति को ‘जीवन तत्व’ के रूप में वर्णित किया जो ब्रह्माण्ड को सहारा देता है ( 7.5) और सूत्र का उदाहरण देते हैं जो एक सुंदर आभूषण बनाने के लिए मणियों को जोडक़र रखती है ( 7.7) । वह इसके कुछ और उदाहरण देते हैं जिससे भिन्न-भिन्न व्याख्याओं की सम्भावना है। ‘ जीवन तत्व’ का वर्णन करते हुए , श्रीकृष्ण ने पहले कहा , ‘‘ कोई भी ‘यह’ बिल्कुल नहीं जानता है , भले ही कई लोग इसका कई तरह से वर्णन करते हैं’’ ( 2.29) । ‘कोई नहीं’ उस व्यक्ति के लिए है जो इंद्रियों के माध्यम से इस जीवन तत्व को समझने की कोशिश कर रहा है जबकि जीवन तत्व इंद्रियों से परे है। निम्नलिखित श्लोकों को समझने के लिए इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है जहां उन्होंने जीवन तत्व का वर्णन किया है। वे कहते हैं ,   ‘‘ मैं जल में रस हूँ , चंद्रमा और सूर्य   में प्रकाश , सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ , आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ’’( 7.8) । रस को आमतौर पर स्वाद के रूप में व्याख्यायित किया जाता है , लेकिन यह इसके वास्तविक अर्थ से दूर है। श्रीकृष्ण पानी की जीवन पोषण क्षमता की बात कर रहे ...

129. भगवान ‘पासा’ खेलते हैं

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  शुरु आाती ब्रह्माण्ड के सृजन के समय , यह सिर्फ ऊर्जा थी और बाद में पदार्थ का आकार लिया। वैज्ञानिक रूप से , यह स्वीकार किया जाता है कि ब्रह्माण्ड में तापमान , घनत्व और मैटर-एंटीमैटर के अनुपात में सूक्ष्म (क्वांटम) भिन्नता थी और इन भिन्नताओं का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है। ये परिस्थितियाँ ही पदार्थ के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं और विज्ञान इस बात से सहमत है कि आज हम अपने चारों ओर जो विविधता देखते हैं उसे बनाने के लिए भगवान पासा खेलते हैं। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी निम्न प्रकृति अष्टांगिक है। अग्नि , पृथ्वी , जल , वायु और आकाश भौतिक संसार के लिए हैं और मन , बुद्धि और अहंकार जीवों के लिए हैं ( 7.4) । अग्नि का अर्थ उस ऊर्जा से है जो आदिकाल से मौजूद है। ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हुआ जिसमें एक ठोस अवस्था (पृथ्वी) , तरल अवस्था (जल) और गैसीय अवस्था (वायु) हैं। उन सभी को रखने के लिए जगह यानी आकाश चाहिए। जीवों के मामले में , जीवित रहने के लिए उनमें एक भेद करने वाली प्रणाली की आवश्यकता होती है। मन सोच का बुनियादी स्तर है (प्रणाली 1 - त्वरित और सहज ज्ञान युक्त) और बुद्धि उच...