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141. ऊर्जा और पदार्थ की अंतर-क्रिया

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  जीवन ऊर्जा और पदार्थ का परस्पर संवाद है। यह सब ऊर्जा के साथ शुरू हुआ और फिर पदार्थ बाद में विभिन्न चरणों में बना। पदार्थ के अणुओं के संयोजन ने विभिन्न गुणों वाले विभिन्न प्रकार के यौगिकों को जन्म दिया जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक विविधता हुई। ऐसा ही एक संयोजन जीवन रूपी भौतिक शरीर है। यह पदार्थ की व्यवस्था से आने वाली ऊर्जा पर निर्भर होता है , जिसे भोजन के रूप में जाना जाता है। कुछ जीवन रूप (वृक्ष) सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाते हैं और अन्य (जानवर) उनके द्वारा बनाए गए भोजन पर आश्रित होते हैं। संक्षेप में , जीवन ऊर्जा और पदार्थ का अंतर-खेल है। यह सन्दर्भ हमें श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त कुछ शब्द जैसे ब्रह्म , कर्म , अध्यात्म , अधिभूतं , अधिदैवं और अधियज्ञ: ( 7.28 और 7.29) को समझने में मदद करेगा। अर्जुन उनके बारे में जानना चाहता है ( 8.1 एवं 8.2) और श्रीकृष्ण कहते हैं , ‘‘ अधिभूत नाशवान प्रकृति है ; अधिदैव पुरुष (पुर यानी शहर में रहने वाला) है और मैं यहां शरीर में रहने वाला अधियज्ञ हूं’’ ( 8.4) । अधिभूतं पदार्थ या ‘रूप’ है जो समय के साथ नष्ट हो जाता है। अधिदैवं शरीर में मौजूद ‘निरा...

140. कर्म क्या है

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  अर्जुन का अगला प्रश्न है कि ‘कर्म क्या है’ जो श्रीकृष्ण के इस आश्वासन के प्रत्युत्तर में है कि जब कोई उनकी शरण में आकर मोक्ष के लिए प्रयास करता है तो ‘अखिलम-कर्म’ यानी कर्म , अकर्म और विकर्म के सभी पहलुओं को समझ पाता है ( 7.29) । इस पर श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं , ‘‘ भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है , वह कर्म   कहा गया है (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्ग:)’’ ( 8.3) । यह समझने के लिए एक कठिन बात है और व्याख्याएं स्पष्टता देने के बजाय मुद्दे को और जटिल बनाती हैं। कर्म की सामान्य व्याख्याएं इसे श्रेष्ठ कर्म , सृजन या यज्ञ इत्यादि कहते हैं , लेकिन ये सभी श्रीकृष्ण जो कह रहे हैं उससे परे हैं। जबकि ‘कर्म’ के संबंध में श्रीकृष्ण का उत्तर ‘होने’ (ड्ढद्गद्बठ्ठद्द) के स्तर पर है , हम इसे ‘करने’ के स्तर पर व्याख्या करते हैं। इसलिए ‘हम’ जो करते हैं वह ‘कर्म’ है की हमारी यह समझ अपर्याप्त है। चूँकि अलग-अलग लोग अलग-अलग समय पर अलग-अलग काम करते रहते हैं , जबकि कोई भी परिभाषा प्रत्येक इकाई के लिए व हर कालखण्ड में मान्य होनी चाहिए - चाहे वह अतीत हो जब मनुष्य मौजूद नहीं थे , वर्तमान या भव...

139. ‘ब्रह्म’ की अवस्था

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  श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया कि जब कोई उनकी शरण लेकर मोक्ष के लिए प्रयास करता है ( 7.29) तो ब्रह्म को महसूस करता है और अर्जुन पूछता है कि ब्रह्म क्या है ( 8.1) । श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘ब्रह्म’ वह है जो अक्षरम (अविनाशी या अक्षय या स्थायी) और परम (सर्वोच्च) ( 8.3) है। इसका तात्पर्य यह है कि इससे परे कुछ भी नहीं है और यह किसी बाहरी कारकों पर निर्भर नहीं है , जबकि हम केवल उन चीजों के बारे में जानते हैं जो परिवर्तनशील , अनित्य और नाशवान हैं। हमारा अपना भौतिक शरीर लगातार बदलता रहता है। ऐसा अनुमान है कि हमारे शरीर का 95 प्रतिशत हिस्सा हमारी जानकारी के बिना लगभग 7 वर्षों में बदल जाता है जबकि हमारा डीएनए स्थिर रहता है। ऐसा अनुमान है कि , सौरमंडल 4 अरब वर्षों में और ब्रह्माण्ड लगभग 150 खरब वर्षों में नष्ट हो जाएगा। इसी तरह हमारे विचार बदलते रहते हैं। चीजों , लोगों और स्थितियों के बारे में राय समय के साथ बदलती रहती है। लोग समान तथ्यों के आधार पर पूरी तरह से विपरीत राय बनाते हैं क्योंकि हम चीजों को अलग-अलग तरह से देखते हैं जैसे पांच अंधे एक हाथी को अलग-अलग तरह से महसूस करते हैं। यहां तक कि...

138. भ्रम पर काबू पाना

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  भगवद्गीता के सातवें अध्याय को ‘ज्ञान-विज्ञान-योग’ कहा जाता है , जो व्यक्त और अव्यक्त की समझ के बारे में है। श्रीकृष्ण इस अध्याय में दो आश्वासन देते हैं। पहला , एक बार ‘यह’ जान लेने के बाद , जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता ( 7.2) और दूसरा , अगर ‘यह’ मृत्यु के समय भी समझ लिया जाए तो भी वे मुझे प्राप्त करते हैं ( 7.29) । व्यक्त (नाशवान) अष्टांगिक है ( 7.4) और अव्यक्त (शाश्वत) जीवन तत्व है जो इंद्रियों से परे है लेकिन मणियों के आभूषण में एक सूत्र की तरह ‘व्यक्त’ को सहारा देता है ( 7.7) । व्यक्त तीन गुणों से उत्पन्न भ्रान्ति ( 7.25); इच्छा और द्वेष की ध्रुवता ( 7.27) के प्रभाव में है जिसे ‘परमात्मा’ की शरण में जाकर पार किया जा सकता है। विज्ञान यह निष्कर्ष निकालता है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (व्यक्त) एक बिंदु से बना है और हम अपने चारों ओर जो कुछ भी देखते हैं वह उस बिंदु से जुड़ा है जो कभी अनंत क्षमता रखता था। इसी तरह की सादृश्यता अव्यक्त के लिए भी मान्य होगी , जहां हम सभी एक अदृश्य तार/केबल के माध्यम से अनंत क्षमता के एक बिंदु (परमात्मा) से जुड़े हुए हैं। भ्रम एक प्रकार का प्रतिरोध ...

137. ‘अ’ से ‘ज्ञ’ का मंत्र

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  हमारे जैसी भौतिक इकाइयां (व्यक्त) निरपवाद रूप से दो प्रकार की भ्रान्तियों से प्रभावित होती है। पहला , तीन गुणों से पैदा हुआ योग-माया है , जो अहंकार (अहम-कर्ता) की ओर ले जाता है जबकि कर्म गुणों के परस्पर प्रक्रिया से होता है। दूसरा इच्छा और द्वेष की ध्रुवीयताओं द्वारा लाई गई भ्रान्ति है जो चीजों , लोगों और भावनाओं को प्राप्त करने की लालसा व कामना पैदा करती है या दूसरों के लिए घृणा उत्पन्न करती है। परन्तु श्रीकृष्ण के कथनानुसार यह इच्छा और द्वेष से प्रभावित हुए बिना साक्षी बनकर रहने के बारे में है। अहंकार और कामना एक दूसरे के पूरक हैं। जबकि अहंकार इच्छाओं को सही ठहराता है , इच्छाएँ , खासकर पूरी हुई इच्छाएँ अहंकार को बढ़ाती हैं। इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं , ‘‘ जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं , वे पुरुष उस ब्रह्म को , सम्पूर्ण अध्यात्म को , सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं ( 7.29) । जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव के सहित तथा अधियज्ञ के सहित मुझे अंतकाल में भी जानते हैं , वे युक्तचित्त वाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं’’ ( 7.30) । दिलचस्प ब...

136. द्वंद्वों की भ्रान्ति

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  श्रीकृष्ण कहते हैं , ‘‘ संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्व रूपी मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं’’ ( 7.27) । हम दो मूल भ्रान्तियों के अधीन हैं। पहला तीन गुणों से उत्पन्न योग-माया है और दूसरा इच्छा और द्वेष के ध्रुवों से उत्पन्न होता है। जब एक का अतिक्रमण हो जाता है , तो दूसरा स्वत: ही पार हो जाता है। अज्ञानता भ्रान्ति का प्रथम स्तर है जिसका परिणाम दुर्गति है। यह दुर्गति उस दर्द के सिवा और कुछ नहीं है , जो हम इसके ध्रुवीय विपरीत सुख का पीछा करते हुए पाते हैं , भले ही कुछ समय बीत जाने के बाद। भ्रान्ति का अगला स्तर दमन है जहां व्यक्ति मुखौटा लगाकर बाहरी दुनिया को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह अंदर के इच्छा और द्वेष के द्वंद्व से मुक्त है। वे दूसरों को नीचा दिखाते हैं और श्रीकृष्ण उन्हें मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहते हैं ( 3.6) । लेकिन असलियत में ये दमन भीतर छिपे होते हैं और कमजोर क्षणों में बाहर आ जाते हैं। एक ज्ञानी की तरह साक्षी की अंतिम अवस्था को प्राप्त करने के लिए , श्रीकृष्ण इन भ्रान्तियों को दूर करने का मार्ग सुझाते हैं और कहते है...

135. योग-माया

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  श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी अपरा प्रकृति व्यक्त है और परा प्रकृति जीवन-तत्व है , जो अव्यक्त है। उनका कहना है कि योग-माया (तीन गुणों से पैदा हुआ भ्रम) उन्हें अलग करता है और हमें उन्हें (परमात्मा को) अजन्मा , अविनाशी ( 7.25), भूत , वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता के रूप में जानने से रोकता है ( 7.26) । योग-माया दर्पणों के कमरे की तरह है जो हमें प्रतिबिंबित करता है और यह जानना असंभव है कि इसके परे क्या है। यह असमर्थता हमें यह निष्कर्ष निकालने के लिए विवश कर देती है कि हर इकाई व्यक्त है यह समझे बिना कि उनके पीछे एक अव्यक्त जीवन-तत्व भी मौजूद है , और श्रीकृष्ण उनको मूर्ख कहते हैं ( 7.24) । यह कुछ नहीं , बल्कि परमात्मा के प्रति अनादर के साथ मनुष्य-मनुष्य के बीच परस्पर बर्ताव है जो असुरों का मार्ग है। बिजली (ऊर्जा) एक उच्च वोल्टेज बिंदु से कम वोल्टेज बिंदु तक प्रवाहित होती है जो रास्ते में विद्युत उपकरणों को सक्रिय करती है। लाक्षणिक रूप से , यदि हम परमात्मा को अनंत वोल्टेज के बिंदु के रूप में लेते हैं , तो ऊर्जा प्रवाह और कुछ नहीं बल्कि श्रद्धा की केबल के माध्यम से हमें प्राप्त होने वाला आश...