219. बन्धन से मुक्ति

 

श्रीकृष्ण कहते हैं “तेज (चारित्रिक तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं, जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4) संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं -एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रवृत्ति मोक्ष प्रदान करती है; जबकि आसुरी प्रवृत्ति निरन्तर बन्धन की नियति का कारण होती है” (16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने में असमर्थ है।

फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अन्दर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता।

विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, इच्छाएँ, नशा या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है।

जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात् करना सीख जाते हैं  जिस प्रकार सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70) जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।


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