33. कर्म पर ध्यान दें, कर्मफल पर नहीं
गीता
के बहुचर्चित श्लोक 2.47 में
श्रीकृष्ण कहते हैं हमें कर्म करने का ही अधिकार है, उसके परिणाम यानी कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। वह आगे कहते हैं कि
कर्मफल हमारे किसी भी कार्य के लिए प्रेरणा नहीं होना चाहिए और यह भी कि हमें अकर्म की ओर झुकना नहीं चाहिए। यह गीता का सर्वाधिक चर्चित श्लोक है क्योंकि जीवन के विभिन्न आयामों में इसे देखा जा सकता है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं श्रद्धा चमत्कार करती है (7.21-7.22)।
केवल श्रद्धा के साथ इस श्लोक के शाब्दिक अर्थ का अभ्यास करने से हम कर्मयोग के शिखर
तक पहुँच सकते हैं। यह हमें उसके तर्क में गहराई तक उतरे बिना या उसके विभिन्न पहलुओं
का विश्लेषण किए बिना उसके सार को आत्मसात् करने में सहायता करेगा।
कर्मों
के परिणाम पर ध्यान केंद्रित करने से कर्म पर हमारा ध्यान हट जाएगा और परिणामस्वरूप हम कर्मफल से ही वंचित हो जाएंगे। एक छात्र द्वारा खराब तरीके से निष्पादित
हुए कर्म यानी पढ़ाई कभी भी वांछित कर्मफल जो कि परीक्षा का अच्छा परिणाम है, नहीं दे सकता है। श्रीकृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि हमें किसी भी परिस्थिति
में सर्वोत्तम प्रदर्शन करने पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
कर्म
वर्तमान क्षण में होता है और कर्मफल हमेशा भविष्य में मिलता है जो कई संभावनाओं का संयोजन है। श्रीकृष्ण हमेशा वर्तमान क्षण में जीने की सलाह
देते हैं क्योंकि केवल वर्तमान पर ही हमारा नियंत्रण हो सकता है, भविष्य या अतीत पर नहीं।
श्रीकृष्ण
आगे स्पष्ट करते हैं कि स्वकर्म के प्रति श्रद्धा से मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता
है
क्योंकि ऐसी श्रद्धा ही परमात्मा की भक्ति है, जिन परमात्मा से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिनसे यह सम्पूर्ण जगत्
व्याप्त है (18.45-18.46)।
दृष्टिकोण
या समझ जो भी हो,
इस श्लोक में सुख और दु:ख की कभी न खत्म होने वाली लहरों को
पार करने में हमारी मदद करके हममें समत्व लाने की क्षमता है।
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