164. स्वतंत्रता शुद्ध है
श्रीकृष्ण
कहते हैं
“शुद्ध (पवित्र) करने वालों में मैं वायु हूँ, और शस्त्रधारियों में मैं श्रीराम हूँ। जलीय जीवों में मैं मगरमच्छ हूँ, और नदियों में मैं जाह्नवी (गंगा) हूँ” (10.31)।
वायु
हमारे शरीर से अशुद्धियों को दूर करने में मदद करती है। रासायनिक प्रक्रियाओं के
कारण खून अशुद्ध होता रहता है और फेफड़ों के माध्यम से वायु इसे शुद्ध करने में
मदद करती है। इस शुद्धिकरण के बिना जीवन कुछ पल भी टिक नहीं सकता। दूसरा, वायु अत्यन्त लचीली और चलनशील है। यह गतिशीलता पर्यावरण को शुद्ध करने में मदद
करती है। तीसरा,
वायु इच्छाओं और दुःखों से स्वतंत्रता अर्थात् मुक्ति है जिसे
मोक्ष कहा जाता है और जो परम शुद्धता का प्रतीक है।
वायु
अनासक्ति का प्रतीक है। वह दुर्गंध को बिना द्वेष के और सुगंध को बिना किसी आसक्ति
के अपने साथ ले जाती है। यह समय के साथ इन दोनों को सहजता से छोड़ देती है। यही
अनासक्ति है
जो आसक्ति और विरक्ति से परे की अवस्था है। कर्तापन की
भावना किसी भी कर्म को पाप बनाती है जबकि सुखद यादों, चीजों,
लोगों आदि से जुड़ना या अप्रिय लोगों से घृणा करना दोनों ही
अशुद्धता है।
‘नियत कर्म’ एक जटिल अवधारणा है। नियत
कर्म को समझने में वायु की ये विशेषताएँ मदद करती हैं कि हमें जो कर्म दिया गया है
उसे बिना किसी लगाव के साथ करना है जैसे हवा गंध को ले जाती है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं वे शस्त्र चलाने वाले योद्धाओं में श्रीराम हैं। भगवान् राम को दयालु
माना जाता है लेकिन वे सच्चाई और मूल्यों के पक्षधर थे। जहाँ रावण निष्ठा रहित
शक्ति का प्रतीक है वहीं श्रीराम निष्ठा और शक्ति का संयोजन हैं। श्रीकृष्ण कहते
हैं यह संयोजन संभव है, जैसा कि श्रीराम में दिखाई
देता है। सत्ता को सही दिशा देने के लिए सत्य निष्ठा अनिवार्य है और यह बात आज के समय
में भी लागू होती है।
श्रीकृष्ण
कहते हैं वह नदियों में गंगा हैं। निश्चित रूप से गंगा अपने आकार के लिए नहीं बल्कि
सदियों से सभ्यता का प्रतीक है जहाँ हर कोई किसी न किसी तरह से इससे जुड़ा हुआ है।

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