193. पास होकर भी दूर
एक
बार एक पिता अपने दस साल के बेटे को खेल के मैदान में ले गया। उसने एक गेंद फेंकी
और खेल का नियम यह था कि लड़के को गेंद वापस लाकर अपने पिता को देना है। मैदान
खिलौनों से भरा था। रास्ते में लड़के का ध्यान एक खिलौने
की तरफ आकर्षित होता है और वह उसके साथ खेलना शुरू कर देता है। तब उसके पिता उसे
गेंद के बारे में याद दिलाने के लिए आवाज लगाते हैं। वह खिलौने को छोड़कर फिर से
गेंद के पीछे दौड़ना शुरू कर देता है।
खेल
के मैदान में अन्य बच्चे भी थे। इस बार लड़के को एक और आकर्षक खिलौना मिल जाता है
और वह उससे खेलना शुरू कर देता है। तभी एक ताकतवर बच्चा आता है और उससे खिलौना छीन
लेता है। इस पर लड़का रोने लगता है। अगली बार लड़का
खुद ही दूसरे छोटे बच्चे से खिलौना छीन लेता है। पूरे खेल में खिलौनों के लिए
बच्चों के बीच झगड़े होते रहते हैं।
इस
दौरान पिता बेटे के ठीक पीछे खड़ा रहता है। लेकिन उस लड़के के लिए जो खिलौनों में
खोया हुआ है
उसके पिता बहुत निकट होकर भी बहुत दूर हैं।
यह
कहानी हमें उस सत्य को समझने में सहायता करती है जब श्रीकृष्ण कहते हैं “वह (‘तत्’) जो समस्त
प्राणियों के भीतर और बाहर स्थित है,
वह चर भी है और अचर भी वही है; सूक्ष्म होने के कारण वह
हमारी इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य नहीं है। वह अत्यन्त दूर है, फिर भी वह हमारे निकट है”
(13.16)।
ऊपर की कथा में पिता की भाँति ‘वह’ (श्रीकृष्ण)
भी हमारे जीवन की सम्पूर्ण यात्रा में हमारे ठीक पीछे उपस्थित रहता है -बस हमें
पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता है। जब हम आसक्तियों में खो जाते हैं तब ‘वह’ विभिन्न अनुभवों
के माध्यम से हमारी सहायता करते हैं। कठिन परिस्थितियाँ प्रदान कर हमें याद दिलाते
हैं, ठीक
वैसे ही जैसे पिता बच्चे को पुकारकर सचेत करता है।
जब
श्रीकृष्ण कहते हैं वह समझ के बाहर हैं तो इसका मतलब यह है
कि हम हमारी इन्द्रियों की सीमाओं के कारण उनको समझ नहीं पाते हैं। वे अनुभवों के
माध्यम से प्राप्त हो सकते हैं लेकिन व्याख्या के माध्यम से नहीं। किसी ऐसे
व्यक्ति के लिए जिसने कभी नमक या चीनी नहीं चखा, कोई भी व्याख्या उनके स्वाद को समझने में मदद नहीं करेगी। उनके स्वाद को समझने
का एकमात्र तरीका उनको चखना है यानी जागरूकता के साथ उनका अनुभव करना है।

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