218. अहिंसा

 

श्रीकृष्ण कहते हैं “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा भी एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है, जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकता है।

सबसे पहले इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दिया था जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति) एक और दैवीय गुण है, जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है।

जब हम किसी व्यक्ति, वस्तु या अनुभव के प्रति आसक्त हो जाते हैं तो उसके खोने की संभावना भय, विरोध और संघर्ष को जन्म देती है। ये हिंसा के सूक्ष्म रूप हैं। इस दृष्टि से “मेरा” का भाव ही हिंसा की जड़ में स्थित है। आसक्ति और अहंकार -दोनों इसी स्वामित्व-बोध से उत्पन्न होते हैं। जैसे-जैसे ये विलीन होते जाते हैं वैसे-वैसे निःस्वार्थ प्रेम और अहिंसा स्वाभाविक रूप से प्रकट होने लगते हैं।

श्रीकृष्ण कहते हैं सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह बिना ईर्ष्या के दूसरों की खुशी को अपनी खुशी के रूप में साझा करना है; और बिना द्वेष के दूसरों के दुख को अपने दुख के रूप में अनुभव करना है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयानों के द्वारा करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया है। त्याग का एक और दिव्य रूप घृणा का त्याग है (5.3)।

श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है।

सत्यवादिता का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारे आंतरिक संतुलन की उपज है।

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